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सोमवार, 10 जनवरी, 2005 को 12:49 GMT तक के समाचार

सुनील रामन
बीबीसी दक्षिण भारत संवाददाता

वह नज़ारा शायद ही कभी भूलेगा

ऐसा नज़ारा मैंने अपनी ज़िदगी में पहली बार देखा.

26 दिसंबर को चेन्नई में सूनामी लहर से हुई बर्बादी की रिपोर्ट करने के लिए मैं नागपट्टनम के लिए रवाना हो गया.

यह यात्रा करीब 500 किमी लंबी थी. देर रात मैं कुडालोर पहुँचा और एक घंटा आराम करके फिर से नागपट्टनम के लिए निकल पड़ा.

ख़बर थी कि नागपट्टनम तमिलनाडु का सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्र है. यह यात्रा मुझे तमिलनाडु के तटवर्ती इलाके के अलग-अलग गाँवों और बस्तियों से ले गई.

सोमवार, 27 दिसंबर की सुबह मैं भरंगमपाडी पहुँचा. करीब एक किलोमीटर की दूरी से ही कुछ अजीब लग रहा था.

बंद दुकानें, रोते-बिलखते लोगों के झुंड.

गाड़ी से उतरा तो देखा कि मेरे सामने लाशों के ढेर लगे थे. इनमें औरतों और बच्चों की लाशें भी थीं.

एक औरत अपनी माँ कि लाश को ठेले में डालकर सबके सामने लाई. वातावरण में एक अजीब सी गंध फैली हुई थी.

अचानक एक औरत रोती हुई आई और मेरे पाँव पड़ गई- उसने सोचा मैं कोई सरकारी अधिकारी हूँ.

तबाही

आगे बढ़ा तो इस विनाशकारी लहर से हुई तबाही का अंदाज़ा हुआ. उजड़े मकान, समुद्र का पानी आस-पास भरा था. कुछ मरे मवेशी पानी में पड़े थे.

वो अजीब गंध यहाँ आते-आते तक अब बदबू बन गई थी. लोग चीख चिल्ला रहे थे. रंग-बिरंगे पानी के घड़े मकानों के सामने तैर रहे थे. एक गाँव का रास्ता नावों से बंद पड़ा था.

अनाचक कुछ लोग चिल्लाने लगे.

मुझे एक गाँववासी खींचकर आगे ले गया. एक तालाब के दूसरी ओर पेड़ पर दो लाशें लटकी हुई थीं. फिर लोगों ने एक मकान के मलबे के नीचे से दो लोगों ने बच्चे कि लाश निकाली.

सूनामी की विनाशकारी लहर को आए 24 घंटे हो गए थे. मगर प्रशासन से अभी तक वहाँ कोई नहीं पहुँचा था. बिना खाने और पानी के यह लोग मरने वालों की गिनती कर रहे थे.

यह नज़ारा आगे कुछ और बस्तियों में देखने को मिला.

लोगों को यह समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ.

समुद्रतट पर रहने वाले मछुआरे और उनके परिवार चक्रवात और बाढ़ का सामना हमेशा से ही करते रहे हैं. लेकिन किसी ने भी वैसी लहर कभी नहीं देखी थी.

प्रशासन ग़ायब

अक्रापट गाँव के पास लाइट-हाउस पर पानी का निशान अभी ताज़ा था.

प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि तीन लहरें आई और सबसे अधिक विनाश दूसरी लहर से हुआ. नारियल के पेड़ कि ऊंचाई तक लहरे उठीं.

इस घटना के पहले तीन दिन का नज़ारा मैं शायद ही कभी भूल पाऊँ.

वो मातम का माहौल, पूरे इलाके पर बर्बादी और मौत का साया, बेसहारा लोगों की गुहार. जाने कितनों की ज़िंदगी मिनटों में पूरी तरह तहस-नहस हो गई.

जिस समय तमिलनाडु प्रशासन चेन्नई में आंकड़ों और बयानों कि राजनीति में फँसा था, हज़ारों लोग बिना राहत सामग्री के तीन दिन इंतज़ार करते रहे.