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मंगलवार, 07 दिसंबर, 2004 को 08:06 GMT तक के समाचार

नादिया असजद
बीबीसी उर्दू संवाददाता

न ख़त्म होने वाला एक सिलसिला...

इस्लामाबाद के इलाके में रहने वाली सलमा को एक घर में बच्चों की देखभाल के लिए रखा गया था.

एक दिन परिवार के सभी लोग एक शादी की दावत में गए थे. सलमा घर पर अकेली थी घर का मालिक अचानक वापस आ गया और उसने सलमा के साथ बलात्कार किया.

पंद्रह वर्षीय सलमा भयभीत हो गई. बाद में उसने अपनी परेशानी इस उम्मीद पर घर की मालकिन को सुनाई कि वह उसकी मदद करेगी, लेकिन मालकिन गुस्से में आ गई और न सिर्फ उसने उसके साथ मारपीट की बल्कि 2000 रूपए देकर उसे नौकरी से निकाल दिया और बाद में उसकी माँ को बुलाकर धमकी भी दी कि वह लोग अपने गाँव वापस चले जाएँ और इस घटना का जिक्र किसी से न करें.

कराची के ग़ैर-सरकारी संगठन "वर्किंग वूमेन मन सपोर्ट सेंटर" के एक अध्ययन के अनुसार घरों, कारख़ानों और इसी तरह के अन्य कामों से जुड़ी महिलाओं को शारीरिक शोषण की समस्या का सामना सबसे ज़्यादा करना पड़ता है.

इसी संगठन की प्रोजेक्ट कोऑर्डनेटर उरूस सहर का कहना है कि घरों और कारखानों में काम करने वाली महिलाओं को भी रोज़गार का दर्जा दिया जाए ताकि इनके अधिकार तय हो सकें.

पाकिस्तान में महिलाओं के बारे में आम तौर पर यह माना जाता है कि उन्हें अपने घर तक ही सीमित रहना चाहिए और अगर वह घर से बाहर निकल कर काम करती हैं तो उनके चरित्र पर सवालिया निशान लगा दिया जाता है.

जाने-अनजाने में अक्सर पुरूषों के ज़हन पर महिलाओं के बारे में यही प्रभाव होता है जो दफ़्तरों में उनके रवैए से ज़ाहिर होता है.

कुछ दिन पहले सिंध पुलिस में, एक महिला को इंस्पेक्टर की हैसियत से तैनात किया गया था उन्हें भी कुछ ऐसी ही शिकायत थी.

उन्होंने कराची के एक पत्रकार अशरफ़ खाँ को निहायत परेशानी की हालत में अपनी कहानी सुनाई.

हालाँकि उस महिला से सीधा संपर्क तो नहीं हो पाया लेकिन अशरफ़ खाँ ने उनके बारे में बताया कि वह बहुत पुख़्ता चरित्र के साथ पुलिस महकमें में आई थीं.

फ़िज़ीकल एजुकेशन में ग्रेजुएट होने के साथ-साथ जुड़ो-कराटे की ब्लैक बेल्ट भी थी.

पुलिस में भर्ती होने के बाद ट्रैनिंग और नियुक्ति तक हर मोड़ पर शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ा जिसमें अधिकारी और उनके साथी सभी शामिल थे.

जब उन्होंने अपने अधिकारियों के आगे हथियार नहीं डाले तो उन्हें जाँच का सामना करना पड़ा और उसके बाद उन्हें नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया गया.

उन्होंने बताया कि पुलिस महकमे में बहुत सी महिलाओं के साथ यही सब होता रहता है लेकिन वह ख़ामोशी से सहती रहती हैं.

यह मामला अख़बारों में आने के बाद गृह मंत्रालय ने कार्रवाई की और उस महिला को अपने पद पर बहाल किया गया.

लेकिन इल्ज़ाम किसके हिस्से में आया? पाकिस्तान के मौजूदा गृह मंत्री फैसल सालेह हयात इस मामले के बारे में कहते हैं, "इस महिला की बहुत सी शिकायतें मिल रही थीं और इनका काम-काज भी कोई ख़ास नहीं था."

इन महिला की शायद सबसे बड़ी ग़लती यह थी कि उन्होंने अपने सीनीयर्स के बारे में शिकायतों का एक सिलसिला शुरू कर दिया. जिनकी जाँच हुई और बाद में सभी शिकायतें बेबुनियाद साबित हुईं. जब यह शिकायतें हद से बढ़ गईं तब पुलिस के कानून के मुताबिक इस महिला को पहले मुअत्तल किया गया फिर बर्ख़ास्त किया गया.

फैसल सालेह हयात कहते हैं-उनके मंत्रालय ने अपने तौर पर जाँच भी की जिससे पता चला कि पुलिस जाँच के दौरान नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया.

इसलिए उक्त महिला को मंत्रालय के आदेशानुसार अपने पद पर बहाल कर दिया गया.
 महिलाओं की स्थिति पर एक आचार संहिता बनाई गई लेकिन कई आपत्तियों और तब्दीलियों के बाद भी यह वह सरकारी फाइलों के नीचे दब कर रह गई है, पता नहीं इसका क्या हुआ?"
 
ज़िया ऐवान

पाकिस्तान में गैर-सरकारी संगठनों ने, दफ्तरों में शारीरिक शोषण के ख़िलाफ आसा के नाम से एक समिति बनाई जिसने इस मक़सद के लिए आचार संहिता बना कर कोशिश की है कि सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों में इस नीति को हिस्सा बनाया जाए. यह आचार संहिता सरकार के सामने भी पेश की गई.

कराची में वकीलों के एक गैर-सरकारी संगठन 'मानव अधिकार और क़ानूनी सहायता' के अध्यक्ष ज़िया ऐवान का कहना है-"कई आपत्तियों और तब्दीलियों के बाद भी यह मसौदा सरकारी फाइलों के नीचे दब कर रह गया है, पता नहीं इसका क्या हुआ?"

दूसरी तरफ मौजूदा गृह मंत्री फैसल साले हयात का कहना है, "ज़िंदगी के कई विभाग होते हैं हर विभाग की अपनी-अपनी ज़रूरतें होती हैं कोई टीचर है, तो कोई डॉक्टर, सब पर एक आचार संहिता लागू नहीं हो सकती और न ही हमें इसकी उम्मीद करना चाहिए."

तो कहने का मतलब यह हुआ कि गैर-सरकारी संगठनों की कोशिश अपनी जगह और इस सिलसिले में उठाए जाने वाले क़दमों की रूकावटें अपनी जगह फिलहाल तो ऐसा ही लगता है कि यह संगठन इस तरह की समस्याओं पर महज़ प्रकाश डालने का फर्ज़ अंजाम दे रहे हैं.

नौकरी करने वाली महिलाओं के बारे में एक आम राय यह है कि उन्हें खुद पर विश्वास होता है और वह अपने हक के लिए लड़ना जानती हैं.

जब ऐसी महिलाएँ शोषण रोकने में नाकाम हैं तो उन महिलाओं और लड़कियों का क्या होगा जिनके मुँह में ज़ुबान ही नहीं है.

उन कम उम्र बच्चियों का क्या होगा जो होश संभालने से पहले ही मर्दों की हवस का शिकार हो जाती हैं. क्या वह ज़िंदगी भर उन घटनाओं को भुला पाएँगी? क्या वह समाज में सिर उठा कर चल सकेंगी?