सोमवार, 06 दिसंबर, 2004 को 11:37 GMT तक के समाचार
शकील अख़्तर
मुख्य संवाददाता, बीबीसी उर्दू, दिल्ली
अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने को 12 बरस बीत चुके हैं.
बारहवें बरस में देश भर की गतिविधियों से लग रहा है कि इसमें लोगों की रुचि कम हो रही है.
अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में मुश्किल से दो सौ लोग इकट्ठे हुए हैं तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी भी भीड़ नहीं जुटा पाई है. और तो और पहली बार ये हुआ है कि संसद की कार्यवाही में कोई बाधा नहीं पड़ी है.
इधर ये मामला पचास बरसों से अदालत में है और अभी भी विवाद जारी है.
बाबरी मस्जिद को छह दिसंबर 1992 को भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के हज़ारों कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में गिरा दिया गया था.
इससे पहले लालकृष्ण आडवाणी ने बाक़ायदा एक देशव्यापी आंदोलन चलाया था.
पुराना मामला
वैसे बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ का मामला सौ साल से भी अधिक पुराना है और 1949 अदालत में है.
भारतीय जनता पार्टी, विश्वहिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों का दावा है कि जिस जगह बाबरी मस्जिद थी वहाँ पहले मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी.
वे दावा करते हैं कि वह स्थान 'भगवान राम का जन्म स्थान है.'
दूसरी ओर मुस्लिम संगठन का कहना है कि ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि वहां पहले मंदिर था.
दिलचस्प तथ्य यह है कि 1949 में वहाँ राम की मूर्ति रखने से लेकर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने तक जो भी घटनाक्रम हुए हैं वे सब पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में हुए हैं.
दिलचस्प यह भी है कि मंदिर में ताला लगाने, नमाज़ पर पाबंदी, पूजा की इजाज़त जैसे तमाम फ़ैसले आज़ाद भारत के धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने लिए थे.
अदालत के फ़ैसले पर राय
हालांकि यह मामला अदालत में है लेकिन इसे लेकर भी सभी पक्षों की अलग अलग राय है.
भारतीय जनता पार्टी बाबरी मस्जिद विवाद के लिए तीन तरह के हल की बात करती है. एक तो यह कि अदालत के फ़ैसले पर वहां राम मंदिर बना दिया जाए. दूसरा यह कि मुस्लिम समुदाय से बात की जाए और वे विवादित स्थल पर अपना दावा छोड़ दें. और तीसरा यह कि संसद में क़ानून बनाकर वहाँ राम मंदिर बना दिया जाए.
सत्ताधारी दल कांग्रेस मानती है कि इस मामले का हल अदालत में ही हो सकता है.
भारतीय जनता पार्टी के नेता आरोप लगाते रहे हैं कि कांग्रेस चाहती है कि यह मामला अदालत में लंबे समय तक चलता रहे ताकि वह मुसलमान वोटों का लाभ उठाती रहे.
कांग्रेस इस आरोप को ग़लत बताती है.
विश्लेषक मानते हैं कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद का मामला चार दशकों तक तो कांग्रेस के हाथों में ही रहा और वही इसे लेकर अलग-अलग फ़ैसले करती रही और भारतीय जनता पार्टी तो आख़िरी समय में परिदृश्य में आई.