बुधवार, 01 दिसंबर, 2004 को 09:20 GMT तक के समाचार
रघु राय
फ़ोटोग्राफ़र
मुझे याद है कि तीन दिसम्बर को हमीदिया अस्पताल में गैस से प्रभावितों और मृत लोगों की तस्वीरें खींचने के बाद हमने सोचा कि श्मसान घाट और कब्रिस्तान का जायज़ा लिया जाए.
वहाँ पर एक छोटे बच्चे के शव को दफ़नाया जा रहा था.
उसका भोला सा चेहरा था, और खुली सी आँखें थीं. मैने जल्दी सी तस्वीरें खीचीं.फिर वे उस पर मट्टी डालने लगे तो दिल में लगा कि वे क्यों उस पर मिट्टी डाल रहे हैं क्यों उसे दफ़नाया जा रहा है.
लेकिन मैं उसे रोक नहीं सकता था.
बाद में वही तस्वीर भोपाल गैस त्रासदी के लिए प्रतीक बन गई.
लेकिन वो बच्चा अकेला नहीं था ऐसे कितनी ही और नन्हीं जानें थीं.
जब बड़े और बूढ़ें मरते हैं तो आदमी अपने आपको समझा लेता है लेकिन जब नन्ही जानें जाती हैं, बच्चों को पीड़ा होती है तो उसकी तकलीफ़ बहुत दूर तक होती है.
याद करने लायक नहीं
वैसे भोपाल की वो त्रासदी याद करने लायक तो नहीं है क्योंकि वह बहुत दुख भरी है.
उस हादसे के कारण लोग आज भी मर रहे हैं.
कहते हैं कि जिन लोगों के शरीर में उस दिन ज़्यादा गैस चली गई उनकी तो उसी दिन मौत हो गई. अब कहा जाता है कि वे लोग भाग्यशाली थे.
लेकिन उस दिन जिनके शरीर में कम गैस गई वे धीमी मौत मर रहे हैं. और आज तक मर रहे हैं. वो और भी त्रासद है.
पिछले दिनों मुझे ग्रीन पीस वालों ने कहा कि चूंकि मैंने बहुत काम किया है भोपाल पर तो एक बार फिर वहाँ जाकर देखूं.
मेरे मन में तो था कि अब 19-20 साल बाद क्या बचा होगा वहाँ. लेकिन वहाँ जाकर मुझे ताज्जुब हुआ कि आज भी वहाँ लोग मर रहे हैं, क्योंकि जिनके शरीर में कम गैस गई थी उनके फेफड़े प्रभावित हो गए, उनका हृदय क्षतिग्रस्त हो गया और उसका कोई इलाज नहीं है.
आज तक न तो यूनियन कार्बाइड ने इसके लिए कोई दवा बताई और न डोव केमिकल्स ने और न भारत सरकार ने इस पर शोध करके गैस पीड़ितों को राहत पहुँचाने के लिए कोई काम किया.
तो भोपाल की वो त्रासदी आज भी वैसी की वैसी आज भी चल रही है.
पेशेवर होना
हम पेशेवर हैं ताकि हम सब इस तरह की घटनाओं और हादसों का सच्चा रुप सही ढंग से सामने रख सकें.
लैंस के पीछे जो इंसान होता है उसके मन में किसी भी हादसे को देखकर जो भावनाएँ जागती हैं जो पीड़ा होती है उसको लेकर बैठ जाना या उस पर रोना धोना मैं भावुकता मानता हूँ.
एक प्रोफ़ेशनल, एक पेशेवर के रुप में हमारा काम जो कुछ है उसको उसी तरह देखना और दिखाना है, और ऐसा करते समय जो कुछ झेलना होता है वह तो जीवन का हिस्सा है.
वो शायद हमें मज़बूत भी बनाते हैं और शायद ये इशारा भी करते हैं कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी और बढ़ी ताकि ऐसा कभी दोबारा हो तो हम ज़्यादा ज़िम्मेदारी से काम कर सकें.
वैसे भी मैं किसी बहुत दुख भरी कहानी को याद करके रोना और किसी बहुत ख़ुशी की ख़बर को बार-बार दोहराना मैं एक जैसी बात समझता हूँ.
जो बीत गया सो बीत गया क्योंकि ज़िंदगी रोके नहीं रुकती.
इसलिए जिस क्षण जो कुछ बीत रहा है उसे उसी क्षण जीना है और पूरी गहनता तथा सच के साथ जीना है.
(जैसा रघु राय ने विनोद वर्मा को बताया)