मणिपुर में सुरक्षाबलों को विशेष अधिकार देनेवाले क़ानून का विरोध कर रहे गुट ने एक बार फिर 10 दिसंबर से आँदोलन करने की धमकी दी है.
अपुंबा लुप नाम का ये संगठन राज्य के 32 छोटे गुटों के बीच समन्वय करता है.
संगठन ने कहा है कि उन्हें इस क़ानून पर भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का रूख़ स्वीकार नहीं है.
उसका आरोप है कि इस क़ानून का सुरक्षाबल बड़े पैमाने पर दुरूपयोग कर रहे हैं और इसे वापस लिया जाना चाहिए.
हालाँकि मनमोहन सिंह ने रविवार को इंफ़ाल से असम रवाना होते वक़्त हिंसा समाप्त किए जाने की बात दोहराई.
उन्होंने कहा कि अगर चरमपंथी बातचीत के लिए तैयार हो जाएँ तो सुरक्षाकर्मियों की ज़रूरत ही नहीं रहेगी.
मतभेद
मनमोहन सिंह ने शनिवार रात को अपुंबा लुप के नेताओं से मुलाक़ात की और उनसे अनुरोध किया कि वे अपना आँदोलन दोबारा शुरू करने से पहले धैर्य रखें.
उन्होंने कहा कि कोई फ़ैसला करने से पहले उन्हें इस क़ानून की समीक्षा हो जाने तक रूकना चाहिए.
प्रधानमंत्री ने इस विवादास्पद क़ानून की समीक्षा के लिए पाँच सदस्यों वाली एक समिति गठित की है.
सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व वाली इस समिति को छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है.
मगर अपुंबा लुप का कहना है कि वे छह महीने तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते और इस क़ानून को अगर 10 दिसंबर तक वापस नहीं लिया गया तो वे पुनः अपना आँदोलन शुरू कर देंगे.
मणिपुर में भरोसा
मनमोहन सिंह ने मणिपुर के अपने दौरे में पूर्वोत्तर भारत में लागू विवादास्पद सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून पुनर्विचार किए जाने का आश्वासन दिया.
लेकिन उन्होंने साथ ही ये भी संकेत दिए कि इस क़ानून को हटाया नहीं जाएगा.
इस वर्ष मणिपुर में मनोरमा देवी नामक एक स्थानीय महिला की मौत के बाद राज्य में इस विवादास्पद क़ानून का जमकर विरोध हुआ था.
सुरक्षाबलों का कहना था कि महिला के संबंध चरमपंथियों से थे जबकि स्थानीय लोग महिला को बेक़सूर बताते हुए उसकी गिरफ़्तारी को ज़्यादती बता रहे थे.
जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मणिपुर के अलगाववादियों को पहले बातचीत के लिए आने और इसके बाद ही किसी और बारे में विचार करने के संकेत दिए हैं.
प्रेक्षकों की राय में प्रधानमंत्री चाहते हैं कि पहले बातचीत शुरु हो और तब ही केंद्र सरकार वहाँ तैनात सुरक्षा बलों की संख्या में कमी लाएगी या ये विवादास्पद क़ानून को हटाएगी.