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शुक्रवार, 05 नवंबर, 2004 को 21:04 GMT तक के समाचार

प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता से

जीवन की साँझ में उपेक्षा का अंधेरा

सास के अत्याचारों की पारंपरिक कहानियों के उलट कोलकाता से पीड़ित सास-ससुर की कहानियाँ सामने आ रही हैं.

महानगर में बेटे-बहू के अत्याचारों से निजात दिलाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने के मामले हाल के वर्षों में तेजी से बढ़े हैं.

कोलकाता हाईकोर्ट के सूत्रों का कहना है कि बीते एक साल में ऐसे लगभग दो हजार मामले विभिन्न अदालतों में आए हैं.

अभियोजन निदेशालय के उप-निदेशक ताज मोहम्मद कहते हैं कि “अब ऐसे कई मामले मिल रहे हैं. इससे पुलिस भी असमंजस में है क्योंकि वह पारिवारिक झगड़े से निपटने का तरीका नहीं तलाश पा रही है.”

ऐतिहासिक फ़ैसला

बीते साल कोलकाता हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद ऐसे मामलों की तादाद बढ़ी है.

तृषित मुखर्जी ने एक एअरलाइन में काम करने वाले अपने पुत्र और उसकी नर्तकी पत्नी के खिलाफ राज्य महिला आयोग की शरण ली थी.

आयोग ने बहू को सम्मन भेजा तो बेटे ने आयोग के अधिकारों को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी. हाईकोर्ट ने बेटे-बहू को तीन दिन के भीतर माँ से माफी माँगने का निर्देश दिया था.

आखिर सामाजिक रिश्तों के तेजी से बिखरने की वजह क्या है? विवेक और अलका का ही मामला लें. दोनों एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं. सप्ताहांत में देर रात चलने वाली पार्टियों और डिस्को के चलते बूढ़े माँ-बाप से तकरार रोज का किस्सा बन चुका था.

डेढ़-दो साल तक चिखचिख चलने के बाद आखिर अब उनके माता-पिता एक वृद्धाश्रम में रहते हैं.

विवेक कहते हैं कि “रोज-रोज के तनाव से तो यह बेहतर है कि अलग रहा जाए.”

वृद्धाश्रम

महानगर में एक वृद्धाश्रम चलाने आशीष सरकार कहते हैं कि “नई पीढ़ी अब पूरी तरह अपने-आप में मस्त है. उनकी जीवनचर्या में बुजुर्गों के लिए कोई जगह ही नहीं बची है.”

कोलकाता स्थित यादवपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की प्रमुख रुबी साइन कहती हैं कि “अब माता-पिता और बच्चों के रिश्ते पहले जैसे मधुर नहीं रहे. महानगर की बदलती जीवनशैली ही रिश्तों में आने वाली इस कड़वाहट के लिए जिम्मेवार है.”

वे कहती हैं कि “दोनों में से कोई भी पक्ष छोटे-छोटे मुद्दों पर भी समझौता करने को तैयार नहीं हैं.”

एक अन्य समाजशास्त्री सुनील सेनगुप्ता कहते हैं कि “ज्यादातर मामलों में बेटे की उम्र पचास पार हो जाने के बावजूद माता-पिता साथ ही रहते हैं. इससे अधैर्य बढ़ा है. वे कहते हैं कि यह रिश्ते महानगरीय व्यस्तता की बलि चढ़ रहे हैं.”

अदालत के निर्देश पर हाल में कई माता-पिताओं को उनके बेटों से भरण-पोषण का खर्च मिला है. लेकिन अब जिस तरह लोग अदालतों की शरण में जा रहे हैं, उससे बेटे के साथ माँ-बाप के रिश्तों को तो कटघरे में खड़ा कर ही दिया है.