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रविवार, 17 अक्तूबर, 2004 को 13:31 GMT तक के समाचार

शालिनी जोशी
देहरादून

गढ़वाल की तलवारों की बात ही कुछ और

अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा के सैनिकों और ग्लैडिएटर और लॉर्ड ऑफ द रिंग्स के वीर नायकों के हाथों में चमचमाती तलवारें तो आपने देखी होंगी लेकिन क्या आप जानते है कि ये तलवारें भारत के गढ़वाल की होती हैं

गढ़वाल की तलवारों का लोहा पूरी दुनिया मानती है.

भले ही आज युद्ध के तौर-तरीक़े बदल गये हों लेकिन सभी देशों की सेनाओं में चाहे वो थलसेना हो, जल या वायुसेना तलवारों का अकारिक महत्त्व आज भी बना हुआ है.

देहरादून की विंडलास स्टीलक्राफ्ट्स से हर साल अमरीकी सेना को 7000 से 10000, इंग्लैंड को क़रीब 1500 और कनाडा की सेना को करीब 500 तलवारें भेजी जाती हैं.

इस साल से यहाँ की तलवारें यूनान (ग्रीस) की सेना की भी शान बनने जा रही हैं.

सेनाओं के अलावा विदेशों में बड़े पैमाने पर लोग सजावट और प्रदर्शन के लिये शौकिया तौर पर भी इन्हें खरीदते हैं.

विंडलास स्टीलक्राफ्ट्स के मालिक सुधीर विंडलास कहते हैं, "पश्चिमी देशों में उन तलवारों और हेलमेट को लेकर एक दीवानगी सी है जिन्हें ऐतिहासिक लड़ाइयों में इस्तेमाल किया गया या बालीवुड की फिल्म में दिखाया गया.यही वजह है कि हमारे पास आर्डर की भरमार रहती है.लेकिन अब हमारा ज़्यादा ज़ोर सेनाओं से अधिक प्रदर्शन के लिए तलवार निर्यात करने पर है."

विंडलास की नज़र अब सिंगापुर,मलयेशिया और अरब और अफ्रीकी देशों पर है.

इतिहास

देहरादून में इस हस्तशिल्प उद्योग का इतिहास कोई 71 साल पुराना है.

1943 में भारतीय सेना के लिये गोरखा खुखरी बनाने के लिये देहरादून में विंडलास स्टीलक्राफ्ट्स की स्थापना की गई थी.

तब से लेकर आज यहाँ 400 तरह की तलवारें और 2000 तरह के हेलमेट बनाए जाते हैं.

इसके अलावा यहाँ के हाथ की कारीगरी वाले लड़ाकू पोशाकों, कवच,ढाल, खुखरी, जूते, तलवारों की मूठ और म्यानों की भी विदेशों में भारी माँग है.

ये साजो-सामान प्राचीन रोम और यूनान के काल से लेकर, मध्यकालीन यूरोप के नाइट्स, अमरीकी गृहयुद्ध से लेकर नाज़ी और प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध तक के हूबहू नमूने या रिप्लिका तैयार किए जाते हैं.

साथ ही ऑस्कर अवॉर्ड से नवाजी गई फ़िल्में 'ग्लैडिएटर', 'रिटर्न ऑफ द ममी" और 'लार्ड ऑफ़ द रिंग्स' जैसी हालीवुड की चर्चित फिल्मों के लिए हेलमेट और तलवारें भी उन्होंने ही बनाई थी और इसके लिए उनके पास बाक़ायदा अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस भी है.

भारतीय तलवारें नहीं

लेकिन सिर्फ विदेशी ही क्यों महाराणा प्रताप और टीपू सुलतान की तलवारें क्यों नहीं?

जवाब में सुधीर कहते हैं, "भारत में हथियार रखने के कानून इतने सख्त हैं कि यहाँ बँदूक की तरह तलवार रखने के लिये भी लाइसेंस चाहिये होता है. इसलिये इन चीजों का यहाँ कोई बाज़ार ही नहीं है. जॉर्ज वॉशिंग्टन की तलवार के तो खरीदार मिल जाएँगे लेकिन महाराणा प्रताप के नहीं."

इन तलवारों को बनाना ख़ासतौर पर इनकी धार और सान चढ़ाना भी एक बारीक कला है और कुछ ही लोगों को इसमें महारत हासिल है.

तीन पीढ़ियों से इस काम को करते आ रहे असलम कहते हैं, “मेरे पिता के समय ये काफी कठिन काम था. अब तकनीक ने इसे कुछ सरल कर दिया है.लेकिन फिनिशिंग का काम तो अब भी हाथ से ही होता है.इसके लिये चाहिये एक तेज़ नज़र और हाथ जो आपकी नज़रों का कहना मानें.”

शायद इसीलिये कहते हैं कि सिर्फ तलवार नहीं बल्कि तलवार की धार देखें.