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शुक्रवार, 08 अक्तूबर, 2004 को 23:21 GMT तक के समाचार

मुशर्रफ़ के दोनों पदों के लिए विधेयक

पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ़ को राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष, दोनों पदों पर बनाए रखने के लिये देश की संसद के निचले सदन नेशनल एसेंबली में एक विधेयक पेश किया गया है.

इस कारण पाकिस्तान की राजनीति में सबसे अधिक विवादास्पद इस मामले ने फिर नया तूल पकड़ लिया है.

विपक्षी सांसदों ने इस क़दम को अवैध और असंवैधानिक बताया है.

विपक्ष का कहना है कि पिछले साल संविधान में किये गये एक संशोधन के अनुसार मुशर्रफ़ दोनों पदों पर नहीं रह सकते.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने पहले ये वादा किया था कि वे 31 दिसम्बर तक सेनाध्यक्ष का पद छोड़ देंगे.

मगर पिछले महीने उन्होंने ये कहा कि 96 प्रतिशत पाकिस्तानी यह चाहते हैं कि वे दोनों पदों पर बने रहें.

जनता की इच्छा

पाकिस्तान के सूचना मंत्री शेख़ रशीद अहमद इस विधेयक के बारे मे कहा कि विधेयक पेश कर वे राष्ट्रपति से यह अनुरोध कर रहे हैं कि वे दोनों पदों पर बने रहें.

शेख़ रशीद अहमद ने कहा,"यह जनता की इच्छा है और देश में लोकतंत्र की स्थिरत और आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिये ज़रूरी है."

पहले इस विधेयक पर सदन की एक समिति विचार करेगी जिसके बाद इसपर मतदान कराया जायेगा.

निचले सदन में मतदान के बाद विधेयक को ऊपरी सदन सेनेट के सामने पेश किया जायेगा.

संवाददाताओं का कहना है कि यह विधेयक एक सप्ताह के अंदर पारित हो सकता है क्योंकि दोनों सदनों में इसे पारित कराने के लिये केवल सामान्य बहुमत चाहिये.

क़ानूनी विवाद

पिछले वर्ष पकिस्तान के मुख्य विपक्षी गठबन्धन के साथ हुए एक समझौते में यह तय हुआ था कि वे सेनाध्यक्ष का पद छोड़ देंगे.

इसके लिये पिछले साल संविधान में 17वाँ संशोधन किया गया था.

विपक्षी दलों का कहना है कि उस संशोधन के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ का दोनों पदों पर बने रहना असंवैधानिक है और अब किसी भी परिवर्तन के लिये संसद में दो तिहाई बहुमत चाहिये.

लेकिन जनरल मुशर्रफ़ के समर्थक संशोधन में किये गये परिवर्तन की इस परिभाषा को नहीं मानते.

पाकिस्तान के चार प्रांतों में से दो ,पंजाब और सिन्ध की प्रान्तीय असेम्बलियों ने तो प्रस्ताव पारित करके जनरल मुशर्रफ़ से अनुरोध किया है कि वे दोनों पदों पर बने रहें.

लेकिन उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत ने मांग की है कि वे सेनाध्यक्ष का पद छोड़ दें.

दुविधा की स्थिति

जनरल मुशर्रफ़ का समर्थन करने वाले पश्चिमी देशों की सरकारों के सामने एक दुविधा की स्थिति है.

एक तरफ़ तो वे यह चाहते हैं कि पाकिस्तान में ऐसा नेता हो जो अल क़ायदा और इस्लामी चरमपंथियों से लड़ सके लेकिन दूसरी ओर वे पाकिस्तान की राजनीति में सेना की निरंतर भूमिका से ख़ुश नहीं हैं.

मई में राष्ट्रमंडल ने पाकिस्तान की सदस्यता पर लगे प्रतिबंध उठाये थे जिसका एक कारण यह था कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ सेनाध्यक्ष का पद छोड़ने के लिये राज़ी हो गये थे.