http://www.bbcchindi.com

बुधवार, 06 अक्तूबर, 2004 को 01:33 GMT तक के समाचार

संजीव श्रीवास्तव
बीबीसी संवाददाता

किसका क्या है दाँव पर महाराष्ट्र में

अगर आपको लगे कि मैं कुछ रूमानी हो रहा हूँ या फिर मेरे विचार और सोच मुंबई के पक्ष में कुछ ज़्यादा ही नज़र आ रहे हैं और एक निष्पक्ष संवाददाता कि भूमिका मैं सही मायने में नहीं निभा पा रहा हूँ तो आप बिल्कुल ठीक सोच रहे हैं.

मुंबई मेरा सबसे प्रिय शहर है और चूंकि अंधे प्रेम में मेरा विश्वास नहीं है, इस कारण भी मैं यह रिपोर्ट आपके सामने रख रहा हूँ.

सबसे पहला कारण इस आपबीती का है इस शहर का टापू होना यानी समुद्र से घिरा होना.

साथ ही यह महासागर इस शहर के खुले सोच और अन्य शहरों के मुकाबले स्वच्छ विचारों का भी जैसे स्रोत है. रचनात्मकता और सृजन को यहाँ बढ़ावा मिलता है, उसकी कद्र होती है.

ख़ास है मुंबई

हुनर के पारखी इस शहर में जात-पात या आपके बाप-दादा कौन हैं, इस आधार पर फ़ैसला लेने की बजाय आप उनके कितना काम आ सकते हैं, आपकी क्या कूव्वत है और आप उनकी या उनकी कंपनी की प्रगति में क्या भूमिका अदा कर सकते हैं, इन बातों पर अपना निर्णय लेते हैं.

जी हाँ इस शहर का भगवान पैसा है और नक़द नारायण की पूजा का चलन कई ऐसी सामाजिक विसंगतियों को यहाँ फलने-फूलने नहीं देता जो देश के कई अन्य हिस्सों में आम है.

अमीर-ग़रीब का फ़र्क मुम्बई से ज़्यादा कहीं नहीं है पर इस तथ्य को भी झूठलाया नहीं जा सकता कि सही रास्ते पर चल कर और अपने अकल और उद्यम के ज़ोर पर भारत में गंगू तेली से राजा भोज बनने कि गुंजाइश अगर किसी शहर में सबसे ज़्यादा है तो वह मुंबई ही है.

तभी तो हज़ारों लोग कुछ बनने का ख़्वाब ले प्रतिदिन यहाँ आते हैं. महिलाएँ मुंबई से ज़्यादा सुरक्षित और किसी महानगर में नही हैं और आम लड़कों और पुरुषों की सोच यहाँ आमतौर पर आक्रामक नहीं है.

कुंठाए यहाँ भी हैं, लेकिन क्रूरता नहीं. माहौल में एक मस्ती है और शहर में है कुछ ऐसी ऊर्जा या करंट जो हमेशा आपको कुछ करने के लिए प्रेरित करता है.

यह चाहे सपनों कि दुनिया हो, लेकिन इतने लोगों के सपने यहाँ सच हुए हैं कि उनके उदाहरण ही स्थानीय लोक-कथा बन चुके हैं और उन लाखों को ताउम्र प्रेरित करते रहते हैं या पूरी तरह हतोत्साहित नहीं होने देते जो इस शहर में फटेहाल ज़िंदगी बसर कर रहे हैं.

महत्वपूर्ण चुनाव

चलिए, मुंबई के बखान से आगे बढ़ें, महाराष्ट्र चुनाव की बात करें जो इस मुंबई यात्रा का कारण है.

इन चुनावों के सपनों में कुछ खास बिंदुओं पर चर्चा करते हैं. विशेषकर उन बातों की जिनका उल्लेख रोज़ की रिपोर्ट में नहीं हो पाता.

पहली तो यही कि राजनीतिक रूप से शायद यह महाराष्ट्र विधानसभा का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव है. इसका सीधा असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने की संभावना है.

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की लोकसभा चुनावों में हार के बाद होने वाला यह पहला चुनाव है और इसीलिए सत्ताधारी यूपीए और एनडीए दोनों के लिए यह एक प्रकार की परीक्षा है जिसका नतीजा दोनों ही गठबंधनों पर राष्ट्रीय स्तर पर पड़ेगा.

अगर काँग्रेस-राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी गठबंधन चुनाव हारता है तो एक ज़ोरदार कोशिश की जाएगी दिल्ली में सरकार गिराने की और भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना गठबंधन पराजित होता है तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का बिखराव लगभग तय है.

आशंका और हताशा

नतीजे को लेकर दोनों ही दल आशंकित हैं. शिवसेना-भाजपा मोर्चे में चुनाव से पहले ही कुछ हताशा है तो काँग्रेस के पास भी शिंदे शासनकाल की एक भी ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसके दम पर वो दोबारा वोट मांगने की स्थिति में हों.

विदर्भ अलग राज्य बने, इस मुद्दे पर काँग्रेस ने अपने क़दम जो पीछे खींचे हैं वह भी उसकी मुश्किलें बढ़ा सकता है. ऊपर से जनता में बदलाव का मानस. पर दो चीज़ें काँग्रेस के पक्ष में है.

एक तो मतदाता का दिल्ली गठबंधन यानी यूपीए, गांधी-परिवार और मनमोहन सिंह के साथ चल रहा हनीमून और दूसरा शिवसेना-भाजपा नेताओं के प्रति उनकी उदासीनता.

दो तथ्य और हैं जिनकी वजह से मुक़ाबला बहुत कड़ा हो गया है.

बड़ी संख्या में बाग़ी उम्मीदवार, सारे गणित पलटने की स्थिति में हैं और यही भूमिका अदा करेंगे समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार.

चूँकि किसी के पक्ष में हवा नहीं है और राजनीतिक तार इतने उलट गए हैं कि प्रेक्षकों का मानना है कि इस बार के मुक़ाबले में मात्र दस सीटों का फ़र्क ही शायद यह तय करेगा की कौन सत्ता पक्ष में बैठता है और कौन विपक्ष में.