मंगलवार, 05 अक्तूबर, 2004 को 08:36 GMT तक के समाचार
दिल्ली में बैठकर देश चलाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों ने बंदरों से हार मान ली.
वे तमाम कोशिशों के बाद बंदरों को मंत्रालयों के आसपास के भगा नहीं पाए और आख़िर उन्होंने देसी तरीक़ा अपनाया और वो कारगर भी रहा.
अब बंदरों को भगाने के लिए लंगूरों की सहायता ली जा रही है.
यानी अब लाल मुँह वाले बंदरों को भगाने के लिए काले मुँह वाले बंदरों का उपयोग किया जा रहा है.
ग़ौरतलब है कि दिल्ली में राष्ट्रपति भवन, कई केंद्रीय मंत्रालयों और सरकारी आवासों पर बंदरों का आतंक है. इन बंदरों ने कई कार्यालयों में घुसकर कई बार कागज़ातों को क्षति पहुँचाई है.
वे कर्मचारियों का भोजन लेकर भाग जाते हैं और कई बार खाने-पीने की चीज़ों के लालच में उनका दूसरा सामान लेकर भी.
सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि बंदरों का आतंक वीआईपी क्षेत्रों में ज़्यादा है और सरकारी मशीनरी ने इन बंदरों को भगाने की हरसंभव कोशिश की पर वे नाकाम रहे.
कैसे भागे बंदर
बंदर भगाने के लिए लंगूरों को किसी ख़ास प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं होती. यह संभव होता है इनकी समझ और आदतों से.
लालमुँह वाले बंदर, लंगूरों को दबंग प्रवृत्ति का मानते हैं और इनसे डरते हैं.
लंगूर पालने वाले इसी का फ़ायदा उठाते हैं. उनको बस यह तय करना होता है कि बंदर किस दिशा की ओर भगाए जाएँ. इसके लिए ये लोग एक नक्शा भी तैयार करते हैं.
कभी-कभी बंदरों से प्रभावित क्षेत्र के हिसाब से इनकी संख्या भी बढ़ा ली जाती है.
योजना भवन में बंदर भगाने का काम करने वाले राजू बताते हैं, "बंदर एकाएक नहीं भागते, किसी से भी उसका घर छीनना आसान नहीं है. पर लंगूरों के खौफ़ से धीरे-धीरे बंदर इन जगहों को छोड़ देते हैं."
फिलहाल सरकारी महकमे ने राहत की साँस ली है. वानर सेना अपने आवास छोड़कर जा रही है पर इंसान की बदौलत नहीं, बंदरों का ही लिहाज रखकर.
रानी की कहानी
पीटीआई भवन से बंदरों को भगाने का काम कर रही ‘रानी’ ने अब इस भवन को बंदर-मुक्त कर दिया है.
![]() रानी को पीटीआई बिल्डिंग में काम मिला हुआ है |
रानी को रोज़ यहाँ अपना काम करना होता है और इसके लिए उसका मालिक, फ़िरोज़ ख़ान रोज़ इसे यहाँ लेकर आता है. इससे फ़िरोज़ और रानी, दोनों की रोटी का जुगाड़ हो जाता है और कर्मचारियों को बंदरों के आतंक से मुक्ति मिल जाती है.
फ़िरोज़ बताते हैं, “हमें इस काम के लिए महीने के साढ़े सात हज़ार रूपये मिलते हैं.”
इससे पहले फ़िरोज़ बंदर नचाने का काम करते थे लेकिन पिछले कुछ सालों से यही काम कर रहे हैं.
वे बताते हैं, “पहले वाले काम में कमाई कम होती थी और कुछ तय आमदनी नहीं थी पर अब गली-गली भटकने से फुर्सत मिल गई है और कमाई भी तय हो गई है.”
फ़िरोज़ के भाई और परिवार के लोग राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ व साउथ ब्लॉक, आकाशवाणी भवन व शास्त्री भवन में बंदर भगाने का काम करते हैं.