शनिवार, 02 अक्तूबर, 2004 को 00:46 GMT तक के समाचार
प्रभाकरमणि तिवारी
बैरकपुर से
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से महज़ 40 किलोमीटर दूर उत्तर 24-परगना के ज़िला मुख्यालय बैरकपुर में महात्मा गाँधी की कई दुर्लभ वस्तुएँ नष्ट होने के कगार पर हैं.
बैरकपुर को 1857 के सैनिक विद्रोह के लिए जाना जाता है. उस बग़ावत के विद्रोही मंगल पांडे ने यहीं आज़ादी की लड़ाई में अपनी शहादत दी थी.
आज़ादी के बाद यहाँ बने गाँधी स्मारक भवन में महात्मा गाँधी के लगभग 28 हज़ार पत्रों की प्रतिलिपियों के अलावा उनकी इस्तेमाल की गई कई अनमोल चीजें रखी हैं लेकिन यह भवन इस समय बदहाली का शिकार है.
केंद्र या राज्य सरकारें इस ओर से पूरी तरह उदासीन हैं. आर्थिक तंगी की वजह से इस भवन का रखरखाव तो दूर, उसके कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करना भी भारी पड़ रहा है.
इस भवन की हालत बहुत ख़राब है. जगह-जगह प्लास्टर उखड़ रहा है. बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता है. भवन के पिछले हिस्से की दीवार भी भरभरा रही है. भवन के आसापस घास का जंगल खड़ा हो गया है.
रक़म चाहिए
स्मारक भवन के सचिव सुप्रिय मुंशी कहते हैं, "केंद्र या राज्य कोई भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है. पूरी इमारत की मरम्मत व रखरखाव के लिए काफ़ी रक़म की ज़रूरत है."
"कर्मचारियों को ट्रस्ट की मामूली आमदनी से वेतन दिया जाता है. पैसों की कमी के कारण भवन में रखी मूल्यवान धरोहर के रखरखाव का समुचित इंतज़ाम नहीं हो पा रहा है."
इस भवन में गाँधी जी के कुछ दुर्लभ पत्रों के अलावा नोआखाली गाँव (अब बांग्लादेश में) के दौरे के दौरान उनकी इस्तेमाल की गई वस्तुओं के अलावा एक हज़ार से ज़्यादा तस्वीरों की प्रतियाँ रखी हैं.
लेकिन रखरखाव के अभाव में ये धीरे-धीरे नष्ट हो रही हैं. बैरकपुर के स्वाधीनता सेनानी 89 वर्षीय हरिसाधन घोष कहते हैं, "किसी ज़माने में इस स्मारक का शुमार देश के प्रमुख स्मारकों में किया जाता था. लेकिन केंद्र व राज्य सरकारों की उदासीनता के कारण यह धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है."
वे कहते हैं कि सरकारें गाँधी जयंती के मौके पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित कर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती हैं लेकिन गाँधी जी के जीवन व आंदोलन से जुड़ी अनमोल धरोहर की रक्षा के प्रति वे पूरी तरह लापरवाह हैं.
हरिसाधन घोष कहते हैं, "शीध्र ही इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो तमाम चीज़ें नष्ट हो जाएंगी."
सुप्रिय मुंशी कहते हैं कि कई सांसदों ने अपने कोटे से इस स्मारक को आर्थिक सहायता देने का वादा किया था लेकिन वे वादे अब तक कोरे ही साबित हुए हैं. संग्रहालय का ख़र्च बढ़ रहा है लेकिन पैसे कहीं से नहीं मिल रहे."
मुंशी का कहना है कि यही हालत रही तो दर्शकों के आने पर पाबंदी लगानी पड़ेगी. जल्दी आर्थिक सहायता नहीं मिली तो यहाँ रखी धरोहर की रक्षा नहीं हो पाएगी.
हर साल गाँधी जयंती के मौके पर उनमें सरकार की ओर से सहायता की उम्मीद जगती है लेकिन कहीं से एक पाई भी नहीं मिलती.