शुक्रवार, 03 सितंबर, 2004 को 07:52 GMT तक के समाचार
प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता से
क्या आपको याद हैं कुतुबुद्दीन अंसारी?
जी हाँ, ये वही व्यक्ति हैं जिनकी गुजरात में सांप्रदायिक दंगों के दौरान, हाथ जोड़कर, हमलावरों के सामने गिड़गिड़ाते हुए तस्वीर अख़बारों में छपी थी.
इसी कारण वे एक तरह से 'दंगों का चेहरा' बन गए थे.
देश-विदेश के कई अखबारों-पत्रिकाओं में उनकी तस्वीर छपने के बाद उन्हें पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने कोलकाता में शरण दी थी.
लेकिन अब वे फिर अहमदाबाद के बापूनगर इलाक़े में अपने घर लौट गए हैं.
माँ बीमार हैं
उन्होंने ऐसा अपनी माँ व भाई के साथ नए सिरे से जिंदगी शुरू करने के लिए किया है.
अंसारी के कोलकाता जाकर बसने की समाचार माध्यमों में जितनी चर्चा हुई थी, उनकी वापसी उतनी ही गुपचुप तरीके से हुई है.
'कम्युनलिज्म कॉंबैट' पत्रिका में अंसारी की कहानी पढ़कर उसे कोलकाता लाए थे राज्य के तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहम्मद सलीम, जो अब मार्क्सवादी सांसद हैं.
मोहम्मद सलीम कहते हैं कि केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के सत्ता में आने के बाद गुजरात के हालात सुधरे हैं.
उनका कहना है कि अब दंगों के मामले की सुनवाई भी ठीक से होने लगी है.
वे कहते हैं कि अहमदाबाद में अंसारी के पड़ोसी भी उसकी वापसी के पक्ष में थे.
उनका कहना है कि राज्य सरकार ने अंसारी को पहले भी शरण दी थी और वह अब भी जब चाहे पश्चिम बंगाल लौट सकते हैं.
सलीम कहते हैं कि अंसारी की माँ इन दिनों बीमार हैं इसलिए अंसारी उनके पास लौटना चाहते थे.
दंगों के दौरान छपी अंसारी की तस्वीर से लोग तो अंसारी को जानने लगे लेकिन इसी कारण उन्हें बेरोज़गार भी रहना पड़ा.
चुनावों में फ़ायदा
पत्नी व बेटी के साथ कोलकाता पहुँचने के बाद अंसारी को तिलजला इलाक़े में एक घर दिया गया और वे दर्जी का काम कर अपनी रोज़ी-रोटी चलाते थे.
इस काम में सरकार के अलावा कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने भी उसकी सहायता की थी.
इस साल हुए लोकसभा चुनावों में अंसारी के प्रति राज्य सरकार के इस रवैए के कारण खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों का पूरा समर्थन मिला.
अंसारी ने पहले तो पार्टी के लिए कुछ इलाक़ों में प्रचार भी किया लेकिन बाद में सरकार ने उसे किसी गोपनीय ठिकाने पर पहुँचा दिया.
कोलकाता उत्तर पूर्व सीट पर तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित पाँजा को मोहम्मद सलीम हराया और पर्यवेक्षक इसका श्रेय काफ़ी हद तक कुतुबुद्दीन के प्रति उनके बर्ताव को देते हैं.