गुरुवार, 02 सितंबर, 2004 को 19:43 GMT तक के समाचार
भारतीय समाज में किन्नरों (हिजड़ों) को अलग नज़र से देखा जाता है और उन्हें अक्सर सामाजिक अवहेलना का शिकार भी होना पड़ता है.
दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में एक किन्नर ने एक बीमा कंपनी से अपना बीमा कराना चाहा तो उसे इनकार कर दिया गया.
इस पर किन्नरों में भारी नाराज़गी है और उन्होंने बीमा कंपनी के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ने की धमकी तक दे डाली है.
जानकी नाम का किन्नर वेल्लोर के निकट एक गाँव में लोगों के हाथ की रेखाएँ पढ़कर भविष्य बताने का दावा करता है और इसमें उसे अच्छी ख़ासी आमदनी हो जाती है.
जानकी की देखभाल करने वाला कोई नहीं है इसलिए उसने सरकारी क्षेत्र की बीमा कंपनी जीवन बीमा निगम से अपना बीमा कराना चाहा.
जानकी को यह जानकर झटका लगा कि जीवन बीमा कराने की उसकी अर्ज़ी कंपनी ने नामंज़ूर कर दी है और इसकी कोई वजह भी नहीं बताई.
बाद में किन्नरों के लिए काम करने वाले एक ग़ैरसरकारी संगठन ने जब इस मसले को उठाया तो उसे बताया गया कि बीमा पॉलिसी के लिए केवल पुरुष और महिलाएँ ही अर्ज़ी दे सकती हैं और जानकी तो इनमें से किसी भी श्रेणी में नहीं है.
मरने के बाद?
जानकी का कहना है कि जब भेड़, गाय, फ़सलों और इमारतों के लिए बीमा है तो एक इनसान को इससे कैसे वंचित किया जा सकता है.
"मैंने तो सोचा था कि अगर मेरा बीमा होगा तो मेरे रिश्तेदार इस लालच में मेरी देखभाल कर सकते हैं कि मेरी मौत के बाद उन्हें मेरी बीमा पॉलिसी से कुछ धन मिल सकेगा."
जानकी ने बीबीसी से कहा, "हमें मतदान का अधिकार है, हमारा राशनकार्ड भी बनता है तो हमें बीमा पॉलिसी क्यों नहीं मिल सकती."
जानकी ने इस मुद्दे पर ज़िला अधिकारियों से संपर्क किया है और विरोध् प्रदर्शन की भी योजना बनाई जा रही है.
तमिलनाडु में पंद्रह हज़ार से ज़्यादा किन्नर हैं राज्य की किन्नर एसोसिएशन महासचिव नूरी का कहना है कि वे बहुत ख़राब हालत में ज़िंदगी गुज़ारते हैं.
नूरी ने बताया कि चुनाव आयोग ने उन्हें पुरुष या महिला के तौर पर पंजीकरण कराने का विकल्प दे दिया है और मतदान का अधिकार भी दे दिया है.
बहुत से किन्नर वेश्यावृत्ति करके जीने के लिए मजबूर हैं जिससे उन्हें बहुत सी बीमारियाँ भी हो जाती हैं. लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने समाज में अपने दर्जे को लेकर सवाल उठाए हैं.
मध्य प्रदेश में तो कई किन्नरों ने पंचायत और विधान सभा का चुनाव भी लड़ा है और कुछ तो जीते भी हैं.