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शनिवार, 21 अगस्त, 2004 को 16:15 GMT तक के समाचार

जयश्री बाजौरिया
मुंबई से

चूड़ियों वाले हाथ में वज़नी डिब्बे

दफ्तर में बैठे-बैठे ही अगर घर का गर्मा-गर्म खाना मिल जाए तो क्या बात है! मुंबई के दफ्तरों में घर से खाना पहुँचाने का काम करते हैं डिब्बेवाले.

सौ साल से ज्यादा पुरानी एक कोऑपरेटिव के क़रीब 5000 लोग शहर में पौने दो लाख लोगों के लिए उनके घर से दोपहर के खाने का टिफिन लेते हैं और लंच टाइम होने से पहले उनके दफ्तर तक पहुँचा देते हैं.

इन्हीं पाँच हज़ार डिब्बेवालों में सात औरतें भी हैं.

पैंतालीस वर्षीय लक्ष्मीबाई बगड़े मीलों पैदल चलती हैं, सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती हैं, घर-घर के चक्कर काटकर सारे टिफिन इकट्ठे करती हैं.

पच्चीस किलो का बोझ अपने कंधों पर ढोकर वो मुंबई की खचाखच भरी लोकल ट्रेनों में सफ़र करती हैं और फिर उन दफ्तरों के चक्कर काटती हैं जहाँ उन्हें टिफिन पहुँचाने हैं.

यही नहीं, लंच का समय ख़त्म होने के बाद वो ये सारे चक्कर दोहराती हैं और टिफिन घरों में वापस लौटाती हैं.

कठिन काम

वह बताती हैं, "मैं ये काम पिछले बीस सालों से कर रही हूँ."

अपने पति की नौकरी छूट जाने के बाद लक्ष्मीबाई ने ये काम मजबूरी में शुरू किया था. लेकिन ये आसान नहीं है, "अब मैं बूढ़ी हो गई हूँ. थक गई हूँ. बीमार पड़ जाती हूँ. एक आदमी कितना काम कर सकता है?"

डिब्बेवालों की संस्था के अध्यक्ष रघुनाथ मेडगे कहते हैं कि ये औरतों का काम नहीं है. "हमें बहुत वज़न उठाना पड़ता है. औरतें कैसे उठायेंगी इतना वज़न? इन डब्बों का वज़न क़रीब 80-90 किलो होता है. इसलिए हम औरतों को इसका आधा वज़न उठाने देते हैं."

मेडगे कहते हैं कि कोई औरत शौक से इस नौकरी में नहीं आती. जो गिनी-चुनी औरते हैं, वो भी मजबूरी में ये कर रही हैं. लक्ष्मीबाई को ये नौकरी इसलिए मिली क्योंकि उनके पति भी डिब्बेवाले हैं.

गृहणियों की राहत

कोमल शाह क़रीब दस सालों से लक्ष्मीबाई के हाथ अपने पति सुजल को खाना भिजवाती हैं. सुजल अगर कुछ ले जाना भूल जाए तो वे भी साथ भिजवा देती हैं.

वे कहती हैं, "मेरे पति सुबह जल्दी ऑफिस जाते हैं. अगर मैं उस वक़्त उनको टिफिन दूँ तो मुझे बहुत जल्दी उठना पड़ेगा."

इतने सालों में सिर्फ एक बार उनसे ग़लती हुई है. वह कहते हैं, "हमें आदत हो गई है. हमें पता है कि अगर मुंबई में ट्रेनें चल रहीं हैं तो हमारा टिफिन सही समय पर पहुँच जाएगा."

लक्ष्मीबाई महीने में चार हज़ार रूपए कमाती हैं. लेकिन अब वो पहले जितना बोझ नहीं उठा पाती हैं, इसलिए उनका बेटा कृष्णा उनका हाथ बँटाता है.

कृष्णा का कहना है, "इतने साल मेरी माँ ने ये काम किया. साथ में घर का काम भी करना पड़ता है. इसलिए अब मैं उनको थोड़ा आराम देता हूँ."

पिछले साल इंग्लैंड के प्रिंस चार्ल्स ने भी अपने मुंबई दर्शन के दौरान इन डिब्बेवालों से मुलाकात की थी. "उसके बाद तो हमारी इज़्ज़त ही बढ़ गई."

मेडगे कहते हैं कि चार्ल्स की मुलाकात की वजह से डिब्बेवालों के काम में भी तरक्की हुई और व्यवसाय भी बढ़ा.