रविवार, 15 अगस्त, 2004 को 03:50 GMT तक के समाचार
प्रभाकरमणि तिवारी
कोलकाता से
कोलकाता के हेतल पारेख बलात्कार और हत्याकांड के अभियुक्त धनंजय चटर्जी को शनिवार को फाँसी तो दे दी गई लेकिन फाँसी के फंदे के लिए जल्लाद नाटा मलिक के घर के लोगों की भीड़ उमड़ रही है.
सुनने में यह कुछ अटपटा लगता हो लेकिन बिल्कुल सच.
धनंजय चटर्जी को अलीपुर जेल में जिस रस्सी से फाँसी के तख़्ते पर लटाकाया गया, उसका एक छोटा सा टुकड़ा पाने के लिए जल्लाद नाटा मल्लिक के घर लोगों का ताँता लग गया है.
इसकी वजह लोगों का यह विश्वास या अंधविश्वास है कि फाँसी के फंदे की रस्सी से दमा जैसी असाध्य बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं.
जल्लाद नाटा मलिक उस रस्सी के टुकड़े ताबीज़ में भर कर बेचते हैं और ख़रीददारों में सिर्फ़ ग़रीब और अनपढ़ ही नहीं बल्कि पढ़े-लिखे और पैसे वाले लोग भी हैं.
नाटा मल्लिक ने पहले भी फाँसी के फंदे वाले ताबीज़ बेच कर हजारों रुपए कमाए हैं.
औषधीय गुण
नाटा मलिक का कहना है कि इस रस्सी में औषधीय गुण होते हैं और उसका दावा है कि ताबीज़ पहनने से कई लोगों को असाध्य बीमारियों से छुटकारा मिल गया है.
इससे पहले 1991 में कार्तिक शील और सुकुमार बर्मन नामक दो अभियुक्तों को फाँसी पर चढ़ाने के कारण उन्हें एक साथ दो फंदे मिले थे.
उन रस्सियों के छोटे टुकड़े ही उनके पास बचे थे. लेकिन धनंजय की सज़ा ने उनका स्टॉक बढ़ा दिया है.
वह कहते हैं कि बीते दो दशकों में उसके पास इतने मरीज़ आए हैं कि वह गिनती ही भूल गया है. लेकिन ताबीज़ पहनने के बाद वे सब स्वस्थ हो गए.
नाटा बताते हैं कि फाँसी के पहले इन रस्सियों पर साबुन, केला और घी लगाने के कारण इनमें औषधीय गुण आ जाते हैं.
यह काम करने वाले वह पहले जल्लाद नहीं हैं. उनके दादा भी ताबीज़ बना कर बेचते थे.
नाटा कहते हैं कि उनकी कोई पक्की नौकरी या पेंशन तो है नहीं इसलिए इस काम से एक तो लोगों का भला होता है और दूसरे, ठीक-ठाक आमदनी भी हो जाती है.
शनिवार, 14 अगस्त 2004 को उन्होंने अपने जीवन की पच्चीसवीं और आख़िरी फाँसी दी.
जेल से बाहर निकलने पर नाटा ने पत्रकारों को बताया कि यह पहला ऐसा मुजरिम था, जो फाँसी के फंदे पर झूलने से पहले की प्रक्रिया के दौरान पूरी तरह शांत रहा.
उसने बस यही कहा कि भगवान सबका भला करें. यह कहते हुए जल्लाद नाटा मलिक भी अपनी आँखें पोंछने लगते हैं.