शुक्रवार, 13 अगस्त, 2004 को 20:40 GMT तक के समाचार
प्रभाकरमणि तिवारी
कोलकाता से
कोलकाता में एक स्कूली छात्रा हेतल पारेख के साथ बलात्कार और फिर उसकी हत्या के मामले में धनंजय चटर्जी को शनिवार को फाँसी दी जानी है.
उन्हें बचाने की अंतिम कोशिश में उनकी पत्नी, माँ और भाई ने राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पास फ़ैक्स से दया याचिका भेजी है.
धनंजय को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की अलीपुर जेल में शनिवार तड़के फाँसी दी जानी है. विडंबना यह है कि उन्हें 41 साल बाद ठीक उसी दिन फाँसी के फंदे पर लटकाया जाएगा जिस दिन वह पैदा हुए थे.
धनंजय की फाँसी से जहाँ हेतल के स्कूल 'वेलैंड गोल्डस्मिथ' के शिक्षक और छात्रा ख़ुश हैं वहीं बांकुड़ा ज़िले में धनंजय के गाँव कुलदीही में मातम का माहौल है.
राष्ट्रपति को फ़ैक्स से भेजी गई दया याचिका में धनंजय की माँ ने अपनी कोख और पत्नी ने अपने सुहाग की रक्षा की गुहार की है.
अपनी अंतिम इच्छा के तौर पर धनंजय ने शुक्रवार को अपने माता-पिता और पत्नी के नाम तीन अलग-अलग पत्र लिखे.
'शहीद'
मगर शनिवार को फाँसी के फंदे पर झूलने के साथ ही धनंजय अपने गाँववालों की नज़रों में एक शहीद बन जाएंगे.
इसकी वजह यह है कि राष्ट्रपति की ओर से दया याचिका ठुकराए जाने के बावजूद सिर्फ़ उनके घर वालों को ही नहीं, बल्कि बांकुड़ा ज़िले के इस अनाम-से क़स्बे के हर ग्रामीण को विश्वास है कि धनंजय बेक़सूर है.
गाँव के माहौल से लगता है मानो किसी हत्यारे को सजा नहीं दी जा रही बल्कि किसी देश प्रेमी को फाँसी के तख़्ते पर लटकाया जा रहा हो.
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में उनके भाई की याचिका ख़ारिज होने के बाद उसके घर वालों के लिए एक-एक पल पहाड़ जैसा भारी हो गया है. वे लोग खाना-पीना और सोना भूल गए हैं.
गाँव के तमाम लोग तीन दिन से धनंजय के घर के सामने इकट्ठा हो गए हैं और सिर्फ़ धनंजय ही नहीं बल्कि गाँव के किसी घर में पिछले तीन दिन से चूल्हा नहीं जला है.
बस चना-चबेना खिलाकर बच्चों की भूख मिटाई जा रही है.
धनंजय के गाँव और उससे पंद्रह किलोमीटर दूर उसकी ससुराल के गाँव में लोगों ने शुक्रवार को पूरी रात जाग कर बिताने का फैसला किया है.
सुप्रीम कोर्ट में याचिका ख़ारिज होने के बाद से ही कुलदीही में लगातार पूजा-पाठ चल रहा है, इस उम्मीद में कि शायद अंतिम क्षणों में कोई चमत्कार हो जाए.
सामूहिक आत्महत्या की धमकी
फाँसी की पुष्टि हो जाने के बाद से ही घरवालों ने पत्रकारों और ज़िला प्रशासन से बातचीत बंद कर रखी है.
धनंजय के घर वालों ने उसे फाँसी होने की हालत में सामूहिक आत्महत्या की धमकी दी है और अब उसके बाक़ी रिश्तेदारों ने भी ऐसी ही धमकी दी है.
यही वजह है कि पूरा गाँव तीन दिन पहले से ही पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है.
इस गाँव से महज 15 किलोमीटर दूर धनंजय की ससुराल में उसकी पत्नी पूर्णिमा पर नज़र रखने के लिए महिला कांस्टेबलों का एक जत्था उसके घर पहुँच गया है.
पूर्णिमा ने तो तीन दिन से बोलना ही छोड़ दिया है. अब तो उसकी आँखें ही बोलती हैं. आँसू हैं कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे.
वैसे फाँसी तय जानते हुए भी धनंजय के पिता बंशीधर ने अब तक आस नहीं छोड़ी है. उनको माँ काली पर पूरा भरोसा है.
वह कहते हैं कि फाँसी देने वाले जल्लाद नाटा मल्लिक का भी भला नहीं होगा. बीते तीन दिनों से पूरे गाँव में 'धनंजय के बाचाओ माँ' यानी 'धनंजय को बचा लो माँ' का सामूहिक स्वर गूँज रहा है.
गाँव के इकलौते काली मंदिर को धनंजय के दादा ने ही बनवाया था.
गाँव वालों का मानना है कि धनंजय के साथ न्याय नहीं हुआ. उसे सामाजिक और आर्थिक तौर पर कमज़ोर होने के कारण ही बलि का बकरा बनाया गया.
ख़ुश हैं छात्र-छात्राएँ
दूसरी ओर धनंजय की फाँसी से हेतल पारेख के स्कूल की प्रधानाचार्या रोसमेरी गिलियन डिकोस्टा हार्ट समेत तमाम शिक्षक और छात्राएँ धनंजय की फाँसी से बिल्कुल भी दुखी नहीं हैं.
डिकोस्टा कहती हैं कि इस मामले में देर ज़रूर हुई लेकिन आख़िर में न्याय मिल ही गया. जैसी करनी वैसी भरनी मुहावरे को दोहराते हुए वे कहती हैं कि धनंजय को फाँसी मिलनी ही चाहिए थी लेकिन उनके घर वालों के साथ उनकी पूरी सहानुभूति है.
घर वालों के लिए स्कूल की शिक्षकों और छात्राओं ने शुक्रवार को प्रार्थना भी की.
हेतल पारेख महानगर के भवानीपुर स्थित जिस अपार्टमेंट में रहती थीं, उसके बाशिंदों में भी धनंजय की फाँसी से संतोष है.
धनंजय की फाँसी कई मायनों में अनूठी रही.
यह पहला मौक़ा था जब किसी मुख्यमंत्री की पत्नी इसके समर्थन में सड़क पर उतरी.
राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की पत्नी मीरा भट्टाचार्य जल्लाद नाटा मल्लिक के साथ फाँसी की माँग में सड़क पर उतरीं. नाटा भी धनंजय को फाँसी देने के पक्ष में था.
सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उन्हें फाँसी देने पर नाटा को दस हज़ार रुपए मिलेंगे बल्कि इसलिए कि धनंजय ने जघन्य अपराध किया था.
नाटा कहता है कि उसे फाँसी होनी ही चाहिए. पहले 24 लोगों को फाँसी के फंदे पर लटका चुके नाटा के हाथों यह आख़िरी फाँसी है. इसके बाद वह इस काम से संन्यास ले लेगा.