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रविवार, 08 अगस्त, 2004 को 08:50 GMT तक के समाचार

बंगलौर से सुनील रामन

झुग्गी-झोंपड़ी वाले भी निकाल रहे हैं पत्रिका

बंगलौर की झोंपड़ पट्टियों में रहने वाले कुछ लोग अपनी समस्याओं और अपने अधिकारी को लेकर आवाज़ बुलंद करने के लिए पत्रिका निकाल रहे हैं.

"स्लम जगुथा" नाम की कन्नड़ भाषा में यह पत्रिका कर्नाटक में झोंपड़ पट्टियों में रहने वालों के बीच संपर्क का एक माध्यम है.

यह पत्रिकार झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले लोगों की की समस्याओं के साथ-साथ उनके अधिकारों के बारे में भी जानकारी देती है. इस पत्रिका से जुड़े अधिकांश लोग दलित हैं.

"स्लम जगुथा" का प्रकाशन चार सालों से हो रहा है और वेबसाइट भी शुरू करने का प्रस्ताव है.

झोंपड़-पट्टी के लोगों द्वारा एक अलग पत्रिका निकालने को सही बताते हैं इसके संपादक अरूल इज़ैक सेल्वा.

वे कहते हैं, "ग़रीबों की समस्याओं की चर्चा मीडिया नहीं करता. अगर कोई ऐसी पत्रिका है भी तो वो अंग्रेज़ी में होती है और उसे निकालने वाले उच्च वर्ग से आते हैं."

सेल्वा के साथ इस पत्रिका को निकालने में जुड़े राजेंद्र, पुष्पलता, सुरेश और दयानंद सभी बंगलौर के किसी न किसी स्लम में रहते हैं.

इन सबका मानना है कि "स्लम जगुथा" में उन्हें नया अस्तित्व दिया है और इससे लोगों में जागरूकता बढ़ी है और उनका आत्मविश्वास भी.

पुष्पलता कहती है कि वे जिन झोंपड़ियों में रहती हैं वहाँ की हालत कुछ समय पहले तक बहुत ख़राब़ थी.

लेकिन अपनी पत्रिका में लगातार लिखने के बाद प्रशासन ने कुछ क़दम उठाए और लोग भी जागरूक हुए.

"स्लम जगुथा" की नज़र समाज में हो रहे बदलावों पर भी रहती है. "टीचर्स डे" जैसे आयोजनों पर किस तरह की रिपोर्ट छपनी चाहिए उस पर इस समय चर्चा चल रही है.

अपने सितंबर के अंक में यह पत्रिका "टीचर्स डे" स्लम में रह रहे लोगों के लिए क्या महत्व रखता है उस पर चर्चा करेगी.

नाराज़गी

25 वर्षीय दयानंद ने पत्रकारिता में डिग्री प्राप्त की है. सम्पादक सेल्वा की उनसे मुलाक़ात एक झोंपड़-पट्टी में हुई और सेल्वा ने उन्हें अपनी टीम में शामिल किया.

दयानंद समाज के उन लोगों से बेहद नाराज़ हैं जो उन लोगों की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते. उनकी नाराज़गी अख़बार और टीवी चैनलों पर भी है.

दयानंद के साथ-साथ उनके कई सहयोगी भी ये मानते हैं कि समाज में एक वर्ग विशेष पर अधिक ध्यान दिया जाता है.

यह पत्रिका निकालने के लिए कोई पैसा नहीं लेता. पत्रिका शुरू करने के समय कुछ लोगों ने चंदा दिया था जिसे बैंक में रखा गया है.

बंगलौर की एक स्वयंसेवी संस्था विधायकों और सरकारी अधिकारियों में इस पत्रिका को बाँटने के लिए 1000 पत्रिकाएं हर महीने ख़रीदती है.

और बाक़ी पाठकों के लिए सालाना 50 रूपए में यह पत्रिका उनके घर पहुंच जाती है.