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सोमवार, 26 जुलाई, 2004 को 20:28 GMT तक के समाचार

संजीव श्रीवास्तव
बीबीसी संवाददाता

बदली हैं सरकारें, जनता की हालत नहीं

देश में नई सरकार बनी है. गरीब, गाँव और किसान के प्रति समर्पित. बजट में इस वर्ग की ही सबसे ज्यादा दुहाई दी गई है. सरकार को सत्ता में आए भी दो माह हो गए हैं.

कुछ लोग कहते हैं कि आखिर नई सरकार का कुछ तो हनीमून-पीरियड होना चाहिए लेकिन बीबीसी दिल्ली ब्यूरो में होने वाले सवेरे की बैठक में इस 'हनीमून' वाले तर्क को कुछ नज़रअंदाज़ करते हुए यह फैसला लिया कि समय आ गया है शुरूआत ही सही, लेकिन ज़रा नई सरकार के इस 'इस गरीब के लिए हैं' गान का ज़मीन पर क्या असर पड़ रहा है इसका जायज़ा लिया जाए.

हो गया फैसला. ज़िम्मेदारी किसे सौंपी जाए, दिल्ली में सभी राष्ट्रीय समस्याओं से जूझ रहे थे. कोई शिबू सोरेन को ढूँढ रहा था तो कोई भारत-पाक वार्ता पर नज़रें गड़ाए बैठा था. आदेश हुआ यह मुआयना दिल्ली बैठे नहीं, बाहर जाकर आपको करना है.

सोचा कहाँ चलें. इसमें भी भाई लोगों ने मदद कर दी. कहा हैदराबाद जाएँ. वहाँ मतदाताओं ने वाजपेयी साहब के साथ-साथ भारत के बिल गेट्स की तर्ज़ पर ढले हुए चंद्रबाबू नायडू को भी रवाना कर दिया था. राज्य और केंद्र सरकार दोनों बदले हैं. जनता का मत बड़ा निर्णायक रहा है. वहाँ जाएँ और देखें अब आंध्र प्रदेश के क्या हाल हैं.

हैदराबाद हमेशा की तरह चमक रहा था. या कहिए पिछले पाँच वर्षों में जैसा चमकता था, वह चमक वर्षा और नायडू के अभाव में भी बरकरार थी. पाँच सितारा होटल भरे हुए थे. कारों की बिक्री जून माह में रिकार्ड तोड़ थी. कम से कम उस टाटा शोरूम के मैनेजर के अनुसार जहाँ बीबीसी की टीम पहुँची. शापिंग मॉल और बड़ी दुकानें ग्राहकों से खचाखच भरी हुई थी.

सरकार बदल गई है, सत्ताधारी नेता भी बदल गए हैं. नायडू के टीडीपी के स्थान पर अब काँग्रेसी हैं. पर सचिवालय, मंत्रियों और अफसरों के घरों के बाहर भीड़ नहीं बदली है.

मतलब यह कि वह तमाम लोग जो नायडू की रवानगी को उन लोगों की पहुँच के भी अंत के साथ जोड़ कर देख रहे थे जो आर्थिक सुधार और हाई-टैक के हामी थे, एकदम ग़लत है. हैदराबाद में बनी हाई-टैक नगरी साईबराबाद अब भी उतनी ही आवश्यक है जितनी पहले थी.

आईबीएम और माइक्रोसॉफ्ट के वरिष्ट प्रबंधक अब भी हैदराबाद में अपने और सॉफ्टवेयर के भविष्य के बारे में उतने ही आशावान हैं जितने नायडू जी के लैप-टाप युग में थे.

अभिजात्य वर्ग के लोगों की बात करें तो आप और हैरान होंगे. आप उनसे पूछिए कि क्या वह कुछ नर्वस हैं. भई, आखिर यह सरकार तो पिछली हुकुमत की विसंगतियों को ठीक करने के लिए ही जैसे सत्ता में आ गई है. यानी गरीब बनाम अमीर, शहर बनाम गांव के मामले में इस नई सरकार का सोच तो बिलकुल साफ है. यह सरकार देश की सत्तर प्रतिशत गरीब, कृषक आबादी के साथ है. आप जरूर कुछ अकेला महसूस कर रहे होंगे. कुछ आशंकित होंगे.

कम से कम मैंने जिन लोगों से बात की उन्होंने तो मेरी ओर ऐसे ही देखा जैसे कि मैं किसी दूसरी दुनिया से आया जंतु हूँ पर एक व्यक्ति जिसका अक़्ल, समझ और दूरदृष्टि से कोई वास्ता नहीं है.

सबका एक सुर में कहना था कि भई आप समझते है नहीं. देश की 70 प्रतिशत जनता का भला नहीं होगा तो देश क्या ख़ाक आगे बढ़ेगा. भुखमरी, गरीबी और उधारी से देश की अधिकतर जनता को छुटकारा नहीं मिलेगा तो भारत उदय भला कैसे होगा. समग्र विकास के लिए आवश्यक है कि देश और समाज का हर तबक़ा आगे बढ़े.

कुछ का यह भी कहना था कि भला अमीर की अनदेखी कौन सी सरकार कर सकती है. पर कुल निर्णय यह था कि अमीर, अभिजात्य और उच्च मध्यम वर्ग न सिर्फ अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त था पर सरकार की गरीबों के प्रति निष्ठा से प्रसन्न भी था और उन नीतियों का समर्थन भी करता दिखता था.

मैंने सोचा भई मजा आ गया. सचमुच देश में रामराज्य आ गया है. अमीर, शहरी तबक़ा ख़ुश है, हैदराबाद की चमक-दमक बरक़रार है, कारोबारी वर्ग अपने मुनाफ़े में कोई संकट नहीं देख रहा है और ग़रीब, किसान को तो कोई फ़िक्र होनी ही नहीं चाहिए. यह सरकार तो है ही उनकी.

फिर ये सोचा वापस दिल्ली लौटने से पहले कुछ गरीबों की सुधरती हालत कि तस्वीर भी देखते चलें, नहीं तो भाई लोग कहेंगे कि एकतरफा ख़ाका खींचकर लौट आए.

उस तरफ देखा तो देखता ही रह गया. गरीब की बस्ती में पानी नहीं है. खेत सूख रहे हैं, सूदखोर का आतंक गाँवों में ज्यों का त्यों कायम है. क़र्ज़ में डूबे आंध्र प्रदेश के किसान नायडू-काल में जैसे कोई नया ओलंपिक रिकार्ड बनाने की रफ़्तार से आत्महत्या कर रहे थे, वह रफ़्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही है.

पिछले दो माह में आंध्र प्रदेश में करीब 800 किसानों, बुनकरों और गरीब मजदूरों ने सूदखोर के चंगुल से बचने के एकमात्र रास्ते के तौर पर ख़ुदकशी को ही चुना है. और नायडू सरकार की ही तरह यह काँग्रेसी सरकार भी आत्महत्या के इन आँकड़ों को विपक्ष का अनर्गल प्रोपगंडा बताकर पिंड छुड़ाने के प्रयास में ही लिप्त है.

गाँव और गरीब के आँसू हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे हैं.

सिर्फ़ सरकार बदली है और कुछ नहीं. सिर्फ नारे बदले हैं और कुछ नहीं. इसलिए सत्ता परिवर्तन पर जो प्रसन्न थे वह नाहक ही ख़ुश हैं और जो दुखी थे वह भी बेकार ही अपनी भावनाएँ ज़ायां कर रहे हैं. कुछ नहीं बदला है.