शनिवार, 24 जुलाई, 2004 को 11:34 GMT तक के समाचार
ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता, मुंबई
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में इस वर्ष भी पिछले तीन वर्षों की तरह बारिश बहुत कम हुई है जिससे पहली फसल तबाह हो चुकी है और कुछ ज़िलों में दूसरी फसल भी बर्बादी के क़रीब है.
बैंकों और साहूकारों के क़र्ज़ों में डूबे किसान परेशान हैं तो कुछ ने क़र्ज़ से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या ही कर ली है.
केवल यवतमाल ज़िले में इस साल पहली अप्रैल से 19 किसान आत्महत्या कर चुके हैं, पिछले साल 51 किसानों ने आत्महत्या की थी और अगर पूरे विदर्भ के आँकड़ों पर नज़र डालें तो पिछले तीन साल में 330 किसान ये क़दम उठाने पर मजबूर हुए हैं.
प्रशासन ये स्वीकार नहीं करता कि सभी आत्महत्याएँ क़र्ज़ और फ़सल की बर्बादी के कारण हुई है लेकिन ये ज़रूर मानता है कि इस क्षेत्र में किसानों की हालत गंभीर है.
ख़तरा
नागपुर के संभागीय आयुक्त शैलेश कुमार शर्मा कहते हैं, "हमें बारिश फौरन चाहिए. अगर 8-10 दिन तक बारिश ठीक से नहीं हुई तो 35-40 प्रतिशत फसल तबाह हो जाएगी और अगर पंद्रह दिन तक बारिश नहीं हुई तब तो स्थिति बहुत गंभीर हो जाएगी."
शर्मा कहते हैं कि राज्य सरकार आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर सकती है ,"प्रशासन इससे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है."
प्रशासन की तैयारियाँ जो भी हों, फसल की तबाही तो होगी ही, साथ ही अगर एक महीने तक बारिश नहीं हुई तो डर है कि क्षेत्र में ट्यूबेल और कुएँ भी सूख जाएंगे.
ग्रामीण इलाकों में पहले से ही पीने के पानी की कमी है और चारा न मिलने के कारण किसानों को अपने पशुओं से भी हाथ धोना पड़ सकता है.
नुक़सान
यवतमाल शहर से 35 किलोमीटर दूर पिंपरी इज़ारा गांव के 65 वर्षीय सोनबाजी ढोंढबाजी पाटिल कहते हैं, "मैंने दो बार बीज बोए और दोनों बार फसल बर्बाद हो गई. मेरे सत्रह हज़ार रुपए डूब गए. अगर इस बार भी फसल नहीं हुई तो आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाएगा."
इनके पड़ोसी श्यामराव शिवदास हुम्ने ने आठ महीने पहले ही ये रास्ता अपना लिया.
छत्तीस हज़ार रूपए के क़र्ज़ के बोझ से तंग आकर उन्होंने आत्महत्या कर ली.
उनकी विधवा मीराबाई कहती हैं कि पति के मर जाने के बाद घर की स्थिति और भी ख़राब हो गई है. वे बताती हैं, "हम बाहर खेतों में काम करते हैं. हमारे भाइयों ने अनाज वगैरा लाकर दिया, बस उसी से घर चल रहा है."
मीरा बाई कहती है कि राज्य सरकार ने एक लाख रुपए का मुआवज़ा देने की घोषणा की थी लेकिन अब तक कुछ नहीं किया है.
उनकी शिकायत है, "हमने इसके लिए अनशन किया, ज़िलाधिकारी से निवेदन किया और किसान संगठनों की मदद से आंदोलन भी छेड़ा लेकिन फिर भी सरकार ने मुआवज़ा नहीं दिया."
मुआवज़ा
ज़िलाधिकारी जीतेन पापलकर कहते हैं कि मुआवज़ा देने के पहले चार चीज़ों पर ग़ौर किया जाता है - पहला, वो किसान होना चाहिए, दूसरा उस पर क़र्ज़ होना चाहिए - बैंक या सोसायटी का, तीसरा, उन्हें क़र्ज़ ली गई संस्था से नोटिस जारी किया गया हो और चौथा, वो अपने परिवार का अकेला कर्ता-धर्ता हो.
कपास की खेती करने वाले किसानों के संगठन के अधिकारी प्रकाश पोहरे कहते हैं कि असल में इन आत्महत्याओं के लिए ज़िम्मेदार ख़ुद सरकार है.
उनका कहना है, "जब मैं इन मामलों को लेकर मुख्यमंत्री के पास गया और उन्हें मामले की गंभीरता समझाई तो उन्होंने कहा कि उनके पास रिपोर्टों के मुताबिक इन आत्महत्याओं का असल कारण है घरेलू झगड़े या फिर बीमारियाँ हैं."
पूरे विदर्भ क्षेत्र में कपास और सोयाबीन उगाने वाले किसानों की संख्या पचास लाख से अधिक है.
पिछले तीन सालों में 330 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.
इस क्षेत्र के किसान सरकार से ख़ासे नाराज़ हैं. उनका कहना है कि इस नाराज़गी का इज़हार वो अक्तूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में करेंगे.