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बुधवार, 07 जुलाई, 2004 को 15:02 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
जयपुर से

इच्छा-मृत्यु की परंपरा जारी है

पश्चिम में जहाँ दयामृत्यु एक विवादास्पद मुद्दा रहा है वहीं भारत के जैन धर्म में इच्छा-मृत्यु की संथारा परंपरा का अब भी पालन किया जा रहा है.

इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए जयपुर के प्रसिद्ध जौहरी पूनम चंद बडेर ने बुधवार को अपनी देह त्याग दी.

जैन समाज का कहना है कि आत्महत्या से इसकी तुलना करना ग़लत होगा.

पूनम चंद 92 साल के थे.

उनकी मौत पर न तो कोई शोक था और न ही विलाप.

जब उनकी अंतिम यात्रा रवाना हुई तो महिलाएँ धार्मिक गीत गा रही थीं और जैन श्रावक अपने धर्म की जयकार के नारे लगा रहे थे.

वहाँ संथारा परंपरा का महिमागान किया जा रहा था.

बडेर ने गत एक जुलाई को संथारा परंपरा का निर्वाह करते हुए खानपान त्यागने की घोषणा कर दी थी.

उनके परिजनों के अनुसार तभी से वे ईश्वर की वंदना में लीन थे. इस दौरान नाते-रिश्तेदारों और श्रद्धालुओं की भीड़ लगी थी.

जैन साधु मान मुनि कहते है कि संथारा जैन धर्म की बहुत प्राचीन परंपरा है. इसमें व्यक्ति घर-परिवार और संसार का मोह त्याग कर निर्वाण प्राप्त कर लेता है.
 इसमें व्यक्ति पूर्ण चेतन अवस्था में संसार से प्रस्थान का निर्णय करता है. उसे भूख-प्यास की अनुभूति नहीं होती है और वो सिद्धि प्राप्त कर लेता है.
 
साध्वी शुभंकरा

अनेक साधु-संतों ने इस मार्ग का अनुसरण किया है.

जैन साध्वी शुभंकरा जी कहती हैं, "इसमें व्यक्ति पूर्ण चेतन अवस्था में संसार से प्रस्थान का निर्णय करता है. उसे भूख-प्यास की अनुभूति नहीं होती है और वो सिद्धि प्राप्त कर लेता है."

बडेर के पुत्र कुशल चंद कहते हैं कि पूरे परिवार ने उनके पिता के इस निर्णय में सहयोग दिया और भावनाओं को बीच में नहीं आने दिया.

राजस्थान हाई कोर्ट के वकील राजीव सुराणा कहते हैं कि ऐसे मामले में क़ानून बीच में नहीं आता है क्योंकि संथारा आत्महत्या नहीं है. यह किसी व्यक्ति के धार्मिक कर्म के निर्वाह का मामला है.