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गुरुवार, 01 जुलाई, 2004 को 11:45 GMT तक के समाचार

दिल्ली से सुशीला सिंह

घरों के अंदर 'असुरक्षित' बच्चियाँ

घरों की चारदीवारी में कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जो वहीं दम तोड़ देती हैं और उनकी चर्चा तक नहीं होती.

इनमें से एक है नाबालिग़ बच्चियों के साथ उन्हीं के परिवार के किसी सदस्य के हाथों यौन उत्पीड़न.

दिल्ली विश्विद्यालय में लगभग चौदह सौ लड़कियों को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण के बाद यह चौंका देने वाला तथ्य सामने आया कि उनमें से कई बचपन में इस तरह की त्रासदी झेल चुकी हैं.

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बचपन के ये घाव सारी उम्र भर नहीं पाते हैं और इसका असर पूरी शख़्सियत पर पड़ता देखा गया है.

यह सर्वेक्षण ग़ैर सरकारी संस्था राही ने कराया था और उससे जुड़ी अनुजा गुप्ता का कहना है कि इसका मक़सद यह जानने की कोशिश थी कि इस तरह की बातों की चर्चा होती है या नहीं.

अनुजा गुप्ता का कहना है, "हम यह भी जानना चाहते थे कि इससे पीड़ित लड़कियों को क्या किसी तरह की मदद या प्रशिक्षण की ज़रूरत है".

दरअसल इस अनुभव से गुज़र चुकी अधिकतर लड़कियों की परेशानी यह होती है कि इस राज़ को किससे बाँटें.

सत्तर प्रतिशत लड़कियों का इस बारे में अपनी सहेलियों से बात करना इस बात का सुबूत है कि उन्हें अपने परिवार के लोगों पर पूरा भरोसा नहीं था.

मनोवैज्ञानिक समीर पारिख का कहना है, "इस उम्र में बच्चा इतना परिपक्व नहीं होता कि वह इस बात की गंभीरता को समझ सके".

यौनाकर्षण

किशोरावस्था में कई बार यौनाकर्षण भी इस तरह के संबंधों को हवा देता है. दोषी व्यक्ति इसका लाभ उठाते हैं जबकि यह पूरी तरह अवैध है.

स्वयंसेवी संस्था राही ने 1998 में एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया जिससे पता चला कि 75 फ़ीसदी लड़कियों या महिलाओं का बचपन में यौन उत्पीड़न हो चुका है.

इनमें से अधिकतर मामलों में उनके परिवार के सदस्यों का ही हाथ था.

इस तरह के मामले कभी-कभी इस वजह से भी सामने नहीं आ पाते क्योंकि कई बार लड़कियाँ इसके लिए ख़ुद को ही दोषी मानने लगती हैं.

वैसे सामाजिक बदलाव के कारण अब इस तरह की घटनाएँ प्रकाश में आने लगी हैं लेकिन अब भी आमतौर पर इन पर पर्दा डाल दिया जाता है.

बच्चों को घर से बाहर अपनी सुरक्षा पर ध्यान देने के सबक़ सिखाए जाते हैं लेकिन घर के भीतर मौजूद इन भेड़ियों से उनकी रक्षा की ज़िम्मेदारी आख़िर किसकी है?