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मंगलवार, 29 जून, 2004 को 20:44 GMT तक के समाचार

प्रभाकर मणि तिवारी
टोटोपारा से

नसंबदी पर पाबंदी है टोटोपारा में

अगर आप साइकिल या ट्रक से सफ़र करके सात पहाड़ी नदियों को पार करके 22 किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं तो टोटोपारा में आपका स्वागत है.

यहाँ रहने वाले टोटो जनजाति के लोगों ने बाहर से आने वाले लोगों को कम ही देखा है, इन लोगों तक सहायता पहुँचाने के लिए सरकारी कर्मचारी भी यह दूरी नहीं तय करते.

टोटो जनजाति दुनिया की लुप्तप्राय जनजातियों में से एक है और यह संभवतः भारत की सबसे कम आबादी वाली जनजाति है.

यह जनजाति ऐसी है जिसके ऊपर परिवार नियोजन या नसबंदी जैसे उपायों के प्रयोग पर प्रतिबंध है क्योंकि उनकी कुल संख्या सिर्फ़ 1265 है, 1991 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ उनकी आबादी 936 थी.

लेकिन ज़िंदगी की कठिनाइयों से परेशान होकर इस जनजाति की महिलाएँ पास के शहर में जाकर फ़र्ज़ी नामों से नसबंदी करा रही हैं क्योंकि टोटोपारा में बच्चों का पेट पालना कोई आसान काम नहीं है.

भूटान की सीमा से लगे टोटोपारा गाँव में केंद्र और राज्य सरकार के विकास कार्यक्रमों की छाया तक नहीं पहुँची है.

अनेक समस्याएँ

पश्चिम बंगाल को असम से जोड़ने वाले हाईवे से 21 किलोमीटर दूर बसे इस गाँव तक न कोई सड़क जाती है और न ही कोई सवारी, रास्ते में पड़ने वाली नदियों को पार करने के लिए कोई पुल नहीं है.

अगर कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाए तो उसे सबसे नज़दीकी अस्पताल ले जाने के लिए कंधों पर उठाकर 21 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है, परिवहन के नाम पर वे ट्रक हैं जो कभी-कभी पहाड़ी नदियों से बालू निकालने के लिए वहाँ पहुँचते हैं.

वैसे एक सरकारी बस भी है लेकिन वह शायद ही कभी चली हो, ऐसे में लोगों के पास स्थानीय ओझा के पास जाकर झाड़-फूँक करवाने का विकल्प ही रह जाता है.

टोटो जनजाति के लिए रोज़गार का कोई साधन नहीं है, पहले भूटान के संतरे इसी रास्ते से होते हुए बांग्लादेश भेजे जाते थे लेकिन उग्रवादियों के ख़िलाफ़ भूटानी सेना के अभियान के कारण वह भी बंद हो गया है.

टोटोपारा में बहुत कम लोग पढ़े-लिखे हैं, बीए पास करने वाले कुल दो लोगों में से एक संजीव टोटो अब आदिवासी कल्याण निरीक्षक के पद पर तैनात हैं.

तकलीफ़ें

रोज़गार का स्थायी साधन और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोग बहुत कठिन जीवन बिताते हैं, बीमारियों की चपेट आकर लोग मरते रहते हैं लेकिन उन्हें बचाने की कोई व्यवस्था नहीं है.

टोटोपारा में काम कर रहे एक ग़ैर सरकारी संगठन टोटो सांस्कृतिक संघ के अध्यक्ष भक्त टोटो कहते हैं, "किसी को हमारी चिंता नहीं है, अव्वल तो कोई मंत्री या अधिकारी यहाँ आता नहीं है, अगर आता भी है तो दोबारा इधर का रूख़ नहीं करता."

वे कहते हैं, "स्थानीय नेता इलाक़े के विकास पर ध्यान देने के बदले बाहर से नेपालियों को लाकर बसाने में अधिक दिलचस्पी लेते हैं."

भारत में टोटो जनजाति का पता लगाने वाले एक अँगरेज़ अधिकारी सैंडर्स 1889 में जानकारी दी थी कि इस जनजाति के 60 परिवार हैं.

सैंडर्स ने इस जनजाति को लगभग दो हज़ार एकड़ ज़मीन पट्टे पर दी थी ताकि वे खेती-बाड़ी करके अपनी ज़िंदगी गुज़ार सकें लेकिन 1969 में उनके लिए संरक्षित ज़मीन को सामान्य ज़मीन में बदल दिया.

इसका परिणाम ये हुआ कि बाहर से आकर वहाँ बसे नेपाली लोगों के कब्ज़े में ज़मीन चली गई.

इस तरह टोटो जनजाति अपने ही घर मे बेगानी हो गई है, इस इलाक़े में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता चेतावनी देते हैं कि अगर कुछ नहीं किया गया तो यह कबीला इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो जाएगा.