शुक्रवार, 18 जून, 2004 को 22:19 GMT तक के समाचार
अतुल संगर
बीबीसी हिंदी
"यह कहना मुश्किल है कि चुनावों में भाजपा की हार के सभी कारण क्या थे? लेकिन गुजरात हिंसा का एक नतीजा था कि हम चुनाव हार गए." - अटल बिहारी वाजपेयी, 12 जून
"गुजरात दंगों का असर पूरे देश में महसूस किया गया. इसके बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटा दिया जाना चाहिए था." - अटल बिहारी वाजपेयी, 13 जून
लोकसभा चुनावों के एक महीने बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब चुप्पी तोड़ी तो भाजपा और संघ परिवार में ख़लबली मच गई.
भाजपा के अध्यक्ष वेंकैया नायडू के साथ-साथ कट्टरपंथी हिंदुवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बचाव में उतर आए.
ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे भाजपा और संघ परिवार के अंदर उदारवादी और कट्टरपंथी खेमों में भीषण खींचतान चल रही हो.
लेकिन क्या वाजपेयी जैसे अनुभवी राजनीतिक नेता को इस विषय पर ऐसी प्रतिक्रिया होने का अहसास नहीं था? यदि पार्टी अध्यक्ष वेंकैया नायडू कुछ सप्ताह पहले तक प्रधानमंत्री रहे अपने नेता की बात काटते नज़र आएँ तो इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या भाजपा में कट्टरपंथी हिंदुवादी खेमा हावी हो रहा है?
गठबंधन की राजनीति
इस पूरे प्रकरण को हाल में हुए लोकसभा चुनावों के संदर्भ में देखना ज़रूरी है. लोकसभा नतीजों ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि भारत में गठबंधन की राजनीति एक वास्तविकता है.
भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 'घटक दल' डीएमके का साथ खो देना महँगा पड़ा. इसीलिए पिछली सरकार को समर्थन देने वाली तेलुगु देशम पार्टी की गुजरात मुद्दे पर नाराज़गी का एहसास भाजपा में है. और वाजपेयी के बयानों में भी इसी राजनीतिक वास्तविकता का एहसास झलकता है.
कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया से वाजपेयी उनसे और अलग नज़र आते हैं और ये घटनाक्रम उनकी उदारवादी छवि को और उभारता है.
![]() वाजपेयी को संन्यास लेने की विहिप नेता की सलाह पर भाजपा ने ही वाजपेयी का बचाव किया |
चुनाव में हार से स्तब्ध वाजपेयी ने ताज़ा घटनाक्रम के बाद ख़ुद को फिर भाजपा के वरिष्ठ, समझबूझ वाले, उदारवादी नेता के रूप में प्रस्तुत किया है.
इसमें दो राय नहीं कि भाजपा और संघ परिवार में कट्टरपंथी और उदारवादी नेताओं के बीच मतभेद रहे हैं लेकिन प्रेक्षक इन्हें वैचारिक मतभेदों से ज़्यादा व्यक्तिगत मानते हैं.
सबसे बड़े उदारवादी नेता
ये इसलिए, कि अहम मुद्दों और मौकों पर तो उदारवादी माने जाने वाले वाजपेयी ने भी बुलंद आवाज़ में कट्टपंथियों को आड़े हाथों नहीं लिया.
बाबरी मस्जिद गिराए जाने को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताने वाले वाजपेयी ने डटकर उसका विरोध नहीं किया.
तीन भाजपा सरकारों के बर्ख़ास्त किए जाने पर वे उसके विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए.
गुजरात दंगों के दौरान वे अधिकतर समय ख़ामोश दिखे और फिर संसद में काँग्रेस-वाम दलों के काम रोको प्रस्ताव पर नरेंद्र मोदी सरकार का बचाव करते नज़र आए.
इसीलिए वाजपेयी के लिए इस समय ये स्पष्ट करना ज़रूरी था कि वे अब भी भाजपा में सबसे बड़े उदारवादी नेता हैं.
आज की राजनीतिक परिस्थितियाँ भाजपा को उदारवादी रवैया अपनाने, अन्य दलों को साथ लेकर चलने और कट्टरपंथ से दूरी बनाते हुए दिखने पर मजबूर करती हैं.
और यही वाजपेयी की ताकत है. इसीलिए वाजपेयी ने ज़ोर देकर गुजरात पर चर्चा की अपनी बात दोहराई है. विहिप की वाजपेयी को राजनीति से सन्यास लेने की सलाह पर भाजपा ने ही वाजपेयी का बचाव किया है.
भाजपा नेता मुख़्तार अब्बास नक़वी ने कहा कि हर भाजपा कार्यकर्ता को वाजपेयी और आडवाणी पर गर्व है और पार्टी के मामलों में कोई दख़ल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उधर आरएसएस ने भी स्पष्ट किया है कि उसे आपत्ति केवल गुजरात दंगों को हार का मुख्य कारण बताए जाने पर है.
पार्टी के संस्दीय बोर्ड की बैठक से पहले वाजपेयी ने "हार की अधिकतम ज़िम्मेदारी" लेकर अपने आलोचकों को चुप कराने की कोशिश की है.
लेकिन अगले कुछ दिन भाजपा में गहमागहमी के रहेंगे और देखना ये है कि भाजपा में अंतर्विरोध के स्वर कैसे शांत होते हैं और भाजपा नेतृत्व गुजरात मुद्दे पर क्या रुख़ अपनाता है?