बुधवार, 09 जून, 2004 को 20:20 GMT तक के समाचार
भारत के विदेश मंत्री नटवर सिंह ने पाकिस्तान और अमरीका के संदर्भ में भारतीय विदेश नीति में बदलाव के संकेत दिए हैं.
आगामी शुक्रवार को प्रसारित होने वाले बीबीसी के हार्ड टॉक इंडिया कार्यक्रम में बातचीत करते हुए उन्होंने नई सरकार की विदेश नीति पर कई सवालों के जवाब दिए.
उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में कश्मीर समस्या के समाधान के लिए यदि बात भारत-पाकिस्तान सीमा में परिवर्तन करने पर ही आ जाती है तो भारत इस विकल्प को बंद नहीं करेगा.
लेकिन उन्होंने ज़ोर देकर ये भी कहा कि इसका ये मतलब नहीं कि भारत अपने अधिकारों के साथ कोई समझौता करेगा.
जब नटवर सिंह से पूछा गया कि उनकी सरकार के अमरीका से रिश्ते कैसे होंगे, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि वे वाजपेयी सरकार के उस नज़रिया से सहमत नहीं कि भारत और अमरीका स्वाभाविक सहयोगी हैं.
उनका कहना था,"मैं ये कहना चाहूँगा कि दोनो देश बहुत नज़दीकी दोस्त हैं. "
'नई शुरुआत करें'
भारतीय विदेश मंत्री का कहना है कि वे पाकिस्तान की सरकार से अपील करेंगे की वह 'नई शुरुआत' करे और उम्मीद करेंगे कि ये नज़रिया ख़त्म हो कि दोनो देशों के बीच रिश्ते तब तक नहीं सुधर सकते जब तक कश्मीर मुद्दे पर प्रगति नहीं होती.
नटवर सिंह का कहना है, "मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि हम उनसे अपील और अनुरोध करेंगे कि जिस रास्ते पर हम 57 साल से चलते आए हैं उससे ऐसे नतीजे नहीं मिले जो वे चाहते थे या फिर जो हम चाहते थे. इसलिए हमें नई शुरुआत करनी चाहिए."
जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी अपील सुनी जाएगी तो उन्होंने कहा कि उन्हे उम्मीद तो है. उन्होंने पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद क़सूरी की प्रशंसा की. उनकी उनसे पिछले 15 दिन में कम से कम चार बार बातचीत हो चुकी है. उनका कहना था, "क़सूरी बहुत स्पष्ट बात करते हैं और मुझे उनका ऐसा करना पसंद है."
नटवर सिंह का ध्यान उस संवाददाता सम्मेलन की ओर दिलाया गया जिसमें विदेश मंत्री क़सूरी के भारत के सीमा में कोई परिवर्तन न करने का ज़िक्र आया था.
![]() इराक़ में सैनिक भेजने पर राष्ट्रीय स्तर पर आम राय चाहते हैं नटवर सिंह |
बीबीसी ने उनसे पूछा कि क्या इससे ये माना जाए कि सिद्धांत तौर पर यदि कश्मीर मुद्दे के हल के लिए सीमा में परिवर्तन की ज़रूरत पड़ती है तो भारत इस संभावना पर विचार करने से इनकार नहीं करेगा?
इस पर नटवर सिंह का कहना था कि हम इस बारे में तब विचार करेंगे जब ऐसी संभावना पर बात होगी.
भारतीय विदेश मंत्री को बताया गया कि इस विषय में उनके विचार पिछले विदेश मंत्री जसवंत सिंह के विचारों से अलग लगते हैं क्योंकि जसवंत सिंह का तो साफ़ कहना था कि 'नक्शे दोबारा नहीं बनाए जा सकते.'
इस पर नटवर सिंह का कहना था कि भारतीय उपमहाद्वीप का नक्शा 1971 में भी बनाया गया था.
जब नटवर सिंह से स्पष्ट पूछा गया उन्हें सीमा के परिवर्तन की संभावना से इनकार नहीं है और वे इस पर विचार करने और सुनने को तैयार हैं, तो उनका कहना था, "जब सीमापार आतंकवाद अपने शिखर पर था तब भी हमारा यही कहना था कि कूटनीतिक दरवाज़े बंद न करें. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि भारत अपने अधिकारों के साथ कोई समझौता करेगा."
भारतीय विदेश मंत्री से ये भी पूछा गया कि क्या कश्मीर समस्या का कोई ऐसा हल हो सकता है जो दोनो देशों को स्वीकार्य हो?
नटवर सिंह ने कहा,"ऐसा हो सकता है. दोनो देशों, विदेश मंत्रालयों, और नेताओं की यही कोशिश होनी चाहिए. दोनो देशों ने ये सब 57 साल तक देख लिया, हम कम से कम माहौल तो बनाएँ. मुझे लगता है कि दोनो देशों की जनता की राय दोनो देशों की सरकारों से कहीं आगे है."
मध्य पूर्व पर नीति
उनसे ये भी पूछा गया कि यदि तीस जून को इराक़ में सत्ता संभालने वाली नई इराक़ी सरकार भारत से शांतिरक्षक दल की माँग करती है तो नई सरकार का क्या रवैया होगा?
नटवर सिंह का कहना था, "हमारा यही रवैया होगा कि इस पर राष्ट्रीय स्तर पर आम राय बननी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का ध्यान से अध्ययन करना होगा. भारतीय सैनिकों पर संयुक्त राष्ट्र का अधिकार होगा या फिर किसी अन्य देश का? पहले ये सब जानकारी मालूम होनी चाहिए."
भारत को हथियार और रक्षा उपकरण बेचने में इसराइल दूसरा बड़ा सहयोगी है. भारत-इसराइल संबंधों पर नटवर सिंह का कहना था, "ये अव्यावहारिक है कि यासिर अराफ़ात के बिना फ़लस्तीन की समस्या हल हो सकती है. हम फ़लस्तीनियों के अधिकारों की बली चढ़ाने पर कभी सहमत नहीं होंगे."
'नेपाल को सैनिक सहायता'
नटवर सिंह ने कहा, "भारत की विदेश नीति पारदर्शी और व्यावहारिक होगी जिसमें भारत के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ अन्य देशों के हितों का ध्यान रखा जाएगा."
नेपाल के माओवादी संघर्ष के बारे में विदेश मंत्री नटवर सिंह ने कहा कि यदि ज़रूरत हुई तो भारत नेपाल को सैनिक मदद देने को तैयार होगा.
नेपाल के संदर्भ में उन्होंने कहा, "1950 की संधि में स्पष्ट है कि वे जैसी भी सहायता चाहेंगे, हम देंगे.
उन्होंने ये भी कहा की आसियान देशों की जुलाई में होने वाली बैठक में वे नोबेल पुरस्कार विजेता विपक्ष की नेता ऑंग सेन सू चि का मुद्दा उठाएँगे.
उनका कहना था, "पूरी दुनिया लोकतंत्र की ओर बढ़ रही है. हर कोई लोकतंत्र चाहता है तो फिर बर्मा में क्यों नहीं?"