शुक्रवार, 04 जून, 2004 को 23:31 GMT तक के समाचार
अमृतसर से असित जौली
बीस साल पहले जब भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर में कार्रवाई शुरु की तो परिसर के अंदर क्या हुआ? प्रत्यक्षदर्शियों ने बीबीसी को मंदिर परिसर और उसके आसपास के इलाके का हाल बताया है.
'तोप के गोले बरसे'
ज्ञानी जोगिंदर सिंह वेदांती जो इस समय अकाल तख़्त के जत्थेदार हैं, पूरी कार्रवाई के दौरान स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद थे.
![]() बीस साल के बाद भी वो जख़्म अभी ताज़ा है |
वे कहते हैं कि जब पाँच जून की शाम को अकाल तख़्त को निशाना बनाते हुए परिसर में टैंक घुसे तो श्रद्धालुओं, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी कर्मचारियों और चरमपंथियों के साथ एक जैसा व्यवहार हुआ क्योंकि सैनिकों के लिए तो सभी दुश्मन थे.
ज्ञानी वेदांती का कहना है, "बहुत सारे निर्दोष व्यक्तियों को भी मार दिया गया.
बीस साल के बाद भी वो जख़्म अभी ताज़ा है. इसलिए भी कि हमारी अपनी सरकार ने हमारे साथ ऐसा किया."
'भिंडरांवाले के शव की पहचान की'
अपार सिंह बाजवा उस समय पंजाब पुलिस में डीएसपी थे और अमृतसर में कार्यरत थे.
![]() 'मैने परिसर के अंदर 800 शवों की गिनती की' |
वे कहते हैं कि उन्होंने जरनैल सिंह भिंडरांवाले, भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल शहबेग सिंह और सिख सटूडेंट्स फ़ैडरेशन प्रमुख अमरीक सिंह के शव देखे.
वे कहते हैं, "मुझे उन लोगों के शवों की पहचान करने को कहा गया. फिर मुझे सिख रिवाज अनुसार उनका अंतिम संस्कार करने को कहा गया जो मैने किया.
पुलिस उपाधीक्षक अपार सिंह का कहना है कि मारे गए लोगों में से अधिकतर आम श्रद्धालु थे.
वे कहते हैं, "भिंडरांवाले के समर्थकों के अलावा मैने परिसर के अंदर 800 शवों की गिनती की.
'पाँच साल कैद, मुकदमा कोई नहीं'
![]() 'बिना मुकदमे के पाँच साल जोधपुर जोल में रहना पड़ा' |
वे बताते हैं कि जब तीन जून को गुरु अरजन देव के गुरुपर्व के दिन वे अपने कुछ दोस्तों के साथ स्वर्ण मंदिर पहुँचे तो कर्फ़्यु लगा दिया गया.
वे कहते हैं, "ये अहसास होते ही कि कुछ गड़बड़ हो सकती है, जब हम लोग एक पिछले रस्ते से बाहर निकलने लगे तो सेना ने हमें वापस परिसर में जाने को मजबूर कर दिया."
उनका कहना है कि उन्होंने अगले तीन दिन और रात तो जैसे किसी युद्ध के मैदान पर व्यतीत किए. वे कहते हैं, "मुझे गोली लगी. मेरे कई साथी तो गोलियाँ लगने से मारे गए. मुझे कई अन्य लोगों के साथ गिरफ़्तार किया गया और यातनाएँ झेलनी पड़ीं."
उन्हें पाँच साल जोधपुर जेल में बिना किसी मुकदमा चलाए रखने के बाद रिहा कर दिया गया.
![]() 'किसी बड़ी कार्रवाई के होने का आभास हो गया था' |
तरलोचन सिंह स्वर्ण मंदिर परिसर के ठीक बाहर मिकैनिक की दुकान करते थे.
उनका कहना है कि उन्हें किसी बड़ी कार्रवाई होने का शक तब हुआ जब अर्धसैनिक बलों ने मई के अंत में उनके घरों के ऊपर मशीनगन चलाने के लिए जगह बनाई.
तीन से छह जून तक मशीनगन और तोपों की आवाज़ ऐसी थी की कोई पागल हो जाए. ये तीन दिन हम पूरी तरह भयभीत रहे.
पुराने बाज़ारों में आग लग गई या लगा दी गई ताकि कोई चरमपंथी भाग न सके.
छह जून की सुबह तक भिंडरांवाले और उनके साथी मारे जा चुके थे.