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शुक्रवार, 04 जून, 2004 को 14:33 GMT तक के समाचार

सलमा ज़ैदी
संपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम

जाने कहाँ गए वे लोग...?

"मुझे अच्छी तरह याद है वह मेरा आठवाँ जन्मदिन था जब हमारे घर पुलिस आई. मेरे पिता को यह कह कर ले गए कि उनसे कुछ पूछताछ करनी है. आज मैं अट्ठारह वर्ष की हूँ और आज तक पापा का इंतज़ार कर रही हूँ..."

कहते-कहते उस लड़की की आँखें भर आईं और उस के बाद वह कुछ नहीं बता सकी.

यह क़िस्सा है अब से तीन साल पहले का जब मानवाधिकारों पर आधारित अपनी श्रंखला इंसाफ़ के लिए सामग्री जुटाने मैं पंजाब गई थी.

मानवाधिकारों की बात हो और पंजाब में लापता हुए लोगों का ज़िक्र न हो यह कैसे हो सकता है.
 वह मेरा आठवाँ जन्मदिन था जब हमारे घर पुलिस आई. मेरे पिता को यह कह कर ले गए कि उनसे कुछ पूछताछ करनी है. आज मैं अट्ठारह वर्ष की हूँ और आज तक पापा का इंतज़ार कर रही हूँ..."
 
अमृत कौर

ये वे लोग थे जो आपरेशन ब्लूस्टार के बाद बड़े पैमाने पर चरमपंथियों की धरपकड़ के अभियान के दौरान लापता हुए थे.

लेकिन क्या ये सब चरमपंथी ही थे...? इस पर कई व्यक्तियों और संस्थाओं को शक है.

उनका कहना है कि कई मामलों में पुलिसवालों ने ख़ुद को 'हीरो' दिखाने के लिए बेक़सूर लोगों को भी पकड़ लिया.

हालाँकि तत्कालीन पुलिस प्रमुख केपीएस गिल इसे अपने ख़िलाफ़ एक सुनियोजित अभियान का नाम देते हैं.

बीबीसी से एक बातचीत में उन्होंने कहा, "यह सब मुझे बदनाम करने की साज़िश थी. पुलिस ने कोई ज़्यादतियाँ नहीं कीं".

पंजाब में लापता लोगों की तलाश के लिए जो ग़ैर सरकारी संस्थाएँ आगे आईं उनमें प्रमुख है लापता लोगों पर समन्वय समिति.

इससे जुड़े रामनारायण कुमार लापता लोगों की तादाद हज़ारों में बताते हैं.

उनका कहना है, "हज़ारों लोगों को पकड़ कर ले गए और उसके बाद वे कहाँ गए कोई नहीं जानता है. उनके घर के लोग आज तक उनकी तलाश में हैं".

जनवरी, 1995 में अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव जसवंत सिंह खालड़ा ने कुछ गोपनीय दस्तावेज़ जारी किए जिनमें कहा गया था कि पंजाब की ख़ुफ़िया एजेंसियाँ कुछ शवों को अज्ञात बता कर उनका दाहसंस्कार कर रही हैं.

खालड़ा का कहना था कि ये शव उन्हीं लापता लोगों के हैं. लेकिन उसी वर्ष सितंबर में खालड़ा का नाम भी लापता लोगों की सूची में आ गया.

इन मामलों की जाँच के लिए सीबीआई के दो जाँच दल गठित हुए और उन्होंने भी अपनी जाँच में इसे मानवाधिकार का मामला बताया.

पंजाब में 17 मार्च, 1997 को राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ और यह मामला उसके पास भी लाया गया.
 हज़ारों लोगों को पकड़ कर ले गए और उसके बाद वे कहाँ गए कोई नहीं जानता है. उनके घर के लोग आज तक उनकी तलाश में हैं
 
रामनारायण कुमार

पंजाब के विकास एवं संचार संस्थान के एक अध्ययन के मुताबिक पंजाब में लोग लापता ही नहीं हुए, वहाँ बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसमें 13 हज़ार महिलाएँ विधवा हुईं और 48 हज़ार बच्चे अनाथ हो गए.

राज्य में लापता लोगों के बारे में अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने समय-समय पर चिंता ज़ाहिर की.

ऐमनेस्टी इंटरनेशनल ने फ़रवरी, 96 में जारी अपनी रिपोर्ट में इस बात पर चिंता ज़ाहिर की कि भारत सरकार इस मामले पर उसकी रिपोर्टों को गंभीरता से नहीं ले रही है.

यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के भी विचाराधीन है.

पंजाब में लापता लोगों की संख्या चाहे सैकड़ों में हो या हज़ारों में. या फिर चाहे उंगलियों पर ही क्यों न गिनी जा सके.

लेकिन यह मामला लापता लोगों के परिवारों के लिए एक भारी आघात है और भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर एक बदनुमा दाग़.