शनिवार, 15 मई, 2004 को 07:59 GMT तक के समाचार
इस्लामाबाद से पॉल एंडरसन
भारत में सत्ता परिवर्तन पर पाकिस्तान में खुशी भी है और चिंता भी.
पाकिस्तान सरकार ने काँग्रेस की जीत के बाद ये उम्मीद जताई कि परिवर्तन से दोनों देशों के बीच जारी शांति प्रक्रिया बाधित नहीं होगी.
पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने आशा व्यक्त की कि काँग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार शांति प्रक्रिया को आगे ले जाएगी.
कई पाकिस्तानी ये मानते हैं कि भारत में वाजपेयी सरकार का पतन अच्छा है क्योंकि कितनी भी उदार क्यों न हो, भाजपा है तो हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी ही.
लेकिन कई लोगों में काँग्रेस की क्षमता को लेकर संदेह का भी भाव है.
देखने में ये बात अजीब लगती है कि पाकिस्तान की सरकार "भारत की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार" के साथ बड़ी आसानी से शांति की गाड़ी को आगे बढ़ाए जा रही थी, लेकिन धर्मनिरपेक्ष मानी जानेवाली काँग्रेस पार्टी को लेकर इतनी सशंकित है.
मगर अतीत के पन्ने पलटे जाएँ तो शंका का आधार भी स्पष्ट हो जाता है.
इंदिरा दौर की खट्टी याद
सोनिया गांधी बहू हैं इंदिरा गांधी की, इस बात का ख़याल आते ही पाकिस्तान के अनेक लोगों को खट्टी यादें घेर लेती हैं.
इंदिरा काल में ही पाकिस्तान के साथ भारत की तीसरी लड़ाई हुई थी जिसमें पाकिस्तान अपमानित होकर हारा और बांग्लादेश का जन्म हुआ.
इंदिरा के बाद राजीव गांधी आए और उनका दौर भी पाकिस्तानियों के लिए मिला-जुला रहा.
नब्बे के दशक में कश्मीर में अशांति का दौर राजीव गांधी के ज़माने में ही शुरू हुआ.
मगर कुछ लोग ये भी मानते हैं कि पाकिस्तान के पूर्व सैनिक शासक ज़िया उल हक़ और दूसरे नेताओं के साथ राजीव गाँधी के अच्छे ताल्लुक़ थे.
वाजपेयी के प्रयास
काँग्रेस की वापसी के बाद सवाल उठ रहे हैं कि वाजपेयी सरकार ने पाकिस्तान के साथ शांति की दिशा में जो बुनियाद तैयार की है उसका क्या होगा.
वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति के लिए व्यक्तिगत तौर पर दिलचस्पी दिखाई और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी गर्मजोशी से उनका साथ दिया.
पाकिस्तान में अब ये चिंता उभर रही है कि क्या सोनिया गांधी भी उतना ही उत्साह दिखाएंगी जितना कि वाजपेयी ने दिखाया.
नई सरकार की पहली परीक्षा तो ये होगी कि वो दोनों देशों के बीच पिछले साल तय बातचीत के कार्यक्रम को मानती है कि नहीं.
आपसी विश्वास बढ़ाने की प्रक्रिया के तहत बातचीत का अगला दौर दो हफ़्ते के भीतर ही शुरू होना तय है.
पाकिस्तान के लोग काँग्रेस के रूख़ को लेकर तो चिंतित हैं ही, उनकी नज़र भाजपा के रवैये पर भी लगी है.
वे जानना चाहते हैं कि विपक्ष में बैठकर भी भाजपा शांति के प्रश्न पर काँग्रेस को समर्थन देती है या फिर हिंदू राष्ट्रवाद का राग अलापना शुरू कर देती है.