भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षा है कि वह मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से 25 सीटें जीत लेगी.
एक तरह से भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने मुख्यमंत्री उमा भारती और पार्टी को प्रदेश में झोंक दिया है.
एक ओर तो विधानसभा चुनाव में दो तिहाई बहुमत से जीत के जोश के बाद भारतीय जनता पार्टी सिंहस्थ कुंभ के इंतजाम में लग गई और लोकसभा चुनाव के लिए वैसी तैयारी नहीं दिखाई पाई.
दूसरी तरफ कांग्रेस-मध्य प्रदेश में बुरी तरह पस्त पार्टी बन गई है, यहाँ तक कि उसे टिकट लेने वाला नहीं मिल रहा था.
कमलनाथ को छोड़कर कोई बड़ा नेता प्रदेश में दिखाई नहीं देता.
ग़लतफ़हमी
सबसे रोचक सीट छिंदवाड़ा की है जहां पूर्व कोयला मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने कमलनाथ को चुनौती दी है.
वैसे मुख्यमंत्री दिग्विजय के भाई लक्ष्मण सिंह ने कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर राजगढ़ सीट से खड़े होने का फ़ैसला करके पार्टी को पहला झटका दिया था. हालांकि भाजपा के भीतर भी इसका ख़ासा विरोध हुआ था.
पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी को भोपाल से टिकट दिया गया बावजूद इसके कि उनके पास दो साल राज्यसभा के बचे थे.
इंदौर से केंद्रीय मंत्री सुमित्रा महाजन और उज्जैन से सत्यानाराण जटिया खड़े हुए.
इंदौर के संगठन मंत्री श्री मोघे को खरगौन सीट पर खड़ा दिया गया.
यानी कांग्रेस में टिकट लेने वाले नहीं थे तो भाजपा में जमकर गुटबाजी चली.
लगता है कि कांग्रेस की सबसे निश्चित जीतने वाली सीट गुना की है जहाँ से ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव लड़ रहे हैं.
हालांकि लोगों में विधानसभा चुनाव की तरह उत्साह नहीं है इसलिए कोई 60-70 प्रतिशत मतदान नहीं हुआ लेकिन यदि उमा भारती की सरकार ने सिंहस्थ के अलावा कुछ काम करने का अवसर निकाल पाती तो लोग निश्चित तौर पर उनके लिए फिर वोट देने को निकलते.
फिर भी मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस की टक्कर में विधानसभा चुनाव जैसी ही तस्वीर दिखाई देती है.