श्रीलंका के सत्तारूढ़ फ्रीडम अलायंस ने कहा है कि वे विद्रोही तमिल टाइगरों को देश में तमिलों के प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देते हैं.
पुरानी नीति से पलटते हुए अलायंस ने एक बयान में कहा है कि शांति वार्ता दोनों प्रमुख गुटों, सरकार और विद्रोहियों के बीच होनी चाहिए.
बयान में नीति में बदलाव की बात को दबाने की कोशिश करते हुए कहा गया है कि इसमें पिछले प्रशासन के रूख़ से भिन्न कुछ भी नहीं है.
उल्लेखनीय है कि ये बदलाव ऐसे समय में आया है जब शांति वार्ता दोबारा शुरू करने के लिए नॉर्वे के विदेश मंत्री, जेन पीटरसन श्रीलंका आने वाले हैं.
तमिल टाइगर इस मान्यता के बगैर बातचीत के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए ये क़दम उठाना ज़रूरी माना जा रहा था.
चुनाव के बाद राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग ने जिस तरह के संकेत दिए थे, उसे देखते हुए इस तरह का क़दम आश्चर्यजनक नहीं था.
लेकिन अभी तक ये स्पष्ट नहीं हुआ है कि फ्रीडम अलायंस में शामिल सभी पार्टियाँ ने इसको मंज़ूरी दी है या नहीं.
फ्रीडम अलायंस का प्रमुख गुट, जेवीपी, विद्रोहियों को मान्यता देने और सत्ता में भागीदारी देने के प्रस्ताव के हमेशा से ख़िलाफ रहा है.
नार्वे की कोशिशें
श्रीलंका की शांति प्रक्रिया से नॉर्वे ने पिछले वर्ष तब हाथ खींच लिए जब श्रीलंका में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सत्ता संघर्ष के बीच तमिल विद्रोही बातचीत से अलग हो गए.
नॉर्वे के प्रयास से ही 2002 में दोनों पक्षों के बीच संघर्षविराम हुआ था जो तबसे जारी है.
श्रीलंका में नई सरकार के गठन के बाद एलटीटीई के साथ शांति प्रक्रिया की नए सिरे से कोशिश हो रही है.
इन्हीं कोशिशों के तहत कुछ दिनों पहले नॉर्वे के विशेष दूत इरिक सोल्हेम ने एलटीटीई के राजनीतिक प्रमुख एसपी तमिलसेल्वन और राष्ट्रपति कुमारतुंग के साथ मुलाक़ात की थी.
नार्वे के विदेश मंत्री, जेन पीटरसन अगले सप्ताह कोलम्बो पहुँच रहे हैं.