(बिंदास बाबू की डायरी)
बीबीसी के प्रिय पाठकों, बिंदास बाबू की आप सबको नमस्कार.
"सर जी, हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है, फिर भी सिर्फ पचास फीसदी वोट ही क्यों पड़ता है. ये तो आधा-अधूरा जनतंत्र हुआ न, ये तो ठीक नहीं." सुबह-सुबह रामभरोसे जी ने सवाल पूछ लिया.
"इसमें क्या 'बे-ठीक' है, अपने मुल्क में हर माल फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी होता है. दूध में पानी फ़िफ़्टी, पानी में दूध फ़िफ़्टी, सीमेंट में रेत फ़िफ़्टी, असल फ़िफ़्टी, नकल फ़िफ़्टी. कहीं-कहीं तो 20-80 का रेशियो होता है."
"इंडिया फ़िफ़्टी, भारत फ़िफ़्टी, इंडिया वोट देता है, फ़िफ़्टी भारत बैठा रहता है. इसमें क्या ग़लत है. शत-प्रतिशत का खेल अझेल है भाई. बताओ, क्या शत-प्रतिशत शुद्ध और थन-कढ़ाऊ दूध झेल पाओगे तुम. अरे पानी मिलाना ही पड़ता है यार."
"लेकिन बिंदास जी, इससे विदेशों में बड़ी किरकिरी हो रही है अपने जनतंत्र की."
"विदेशों में कौन माई का लाल है जो हमारे जनतंत्र पर हँसे. अपना ये फ़िफ़्टी परशेंट भी अमरीका और यूरोप के सारे वोटरों पर भारी पड़ता है. 50-60 करोड़ का फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी करो यार. किसी की क्या मजाल जो हमारे जनतंत्र की फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी बात पर हँसे. वहाँ तो 20-80 का अनुपात हुआ करता है."
"लेकिन सर जी, अगर शत-प्रतिशत हो जाए तो चारों युगों और तीनों लोकों के लिए रिकार्ड हो जाएगा. देखिए हमारे राष्ट्रपति जी ने, 'पीएम' जी ने, 'सीएम' जी ने और आयोग के 'ईसी' जी ने जनता से कहा था कि सब वोट डालने आना."
"निगोड़ी जनता फिर भी घरों में बैठी रही. बाहर नहीं निकली. सेंसेक्स लुढ़का लिया. अपना पैर तोड़ लिया. इस फ़िफ़्टी को अपने निफ़्टी पर तरस तक न आया."
"देखो भइया रामभरोसे, इन दिनों सारे के सारे नेता, सारे दल, सड़क-बिजली-पानी देने को मचल रहे हैं. कब बिजली आए, कब चली जाए, कब पानी और सड़क आए और घर के ठीक पास से चली जाए, आधे लोग इसी लिए बिजली, पानी और सड़क के इंतज़ार में घर पर ही बैठे रहे होंगे. आधों को वोट के लिए भेजा होगा, बड़ी चतुर जनता है अपनी."
"अरे, पाँच हज़ार साल से जनता जानती है कि-
"कोउ नृप होए, हमें का हानी.
चेर छाड़ि न होए रानी."
"जनता महामहिमों की बात भला काहे को सुनेगी?"
"नहीं सर जी, आगे से वोट न देने वाले पर 'फ़ाइन' लगा देना चाहिए. हमारा 'सजेशन' है, जैसा ऑस्ट्रेलिया में होता है."
"यार रामभरोसे, तुम भी कैसी बहकी-बहकी बातें करते हो. जिस जनता के पास धेला कमाने को नहीं, खाने को नहीं, उससे तुम फ़ाइन लोगे. अरे वोट तो 'च्वॉइस' का मामला है."
"कायदे से तो नेताओं पर फ़ाइन लगा देना चाहिए जिन्होंने जनतंत्र का अचार-मुरब्बा बना दिया है. वैसे, जिन्होंने वोट नहीं दिया है, उन्होंने न देकर भी एक वोट तो दिया है न."
"सो कैसे बिंदास जी, आप तो पहेली बुझा रहे हैं."
"देखिए, जिन्होंने नहीं दिया, उन्होंने न देकर इस सिस्टम को रिजेक्ट किया. कह दिया कि भई कुछ कर लो, ये सिस्टम अपने काम का नहीं है. जनता निराश होकर बार-बार यही कह रही है."
"अरे बिंदास जी, इसी तरह तो चोर-उचक्के, माफिया, उठाईगीरे, कतली, दँगाई लोग चुन-चुन कर आते रहते है. नहीं बदलोगे सिस्टम तो बदलेगा कैसे. जनता को हस्तक्षेप तो करना चाहिए. बाहर तो निकलना चाहिए."
"देखिए रामभरोसे जी, ज़्यादा प्रोग्रेसिव मुहावरा मत मारिए. आपकी प्यारी जनता नेताओं से ऊब गई है. एक नागनाथ हैं, दूसरे साँपनाथ हैं, तीसरे अजगरनाथ हैं. सब एक से एक हैं."
"पाँच साल में अपना पेट इस कदर भर लेते हैं कि फ़िर और किसी के पेट में जगह ही नहीं बचती. फ़िर एक-दूसरे को झूठा कह-कहकर पेट भरने की माँग करते हैं."
"अब तो हर दल एक-दूसरे जैसा ही नज़र आने लगा है. जनता जान गई है, इसी लिए वोट न डालकर प्रोटेस्ट करती है."
"इतने बड़े-बड़े नेताओं ने आवाहन किया तो कुछ तो सोचना चाहिए था." रामभरोसे ने फिर कहा.
"यार कितने बड़े-बड़े, जनता की नज़र से देखो, तो ये सब उसी के बनाए, हल्के, मिट्टी के पुतले हैं. अपने बनाए हुए पुतलों की असलियत जनता ही जानती है. इसी लिए उसने फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी कर दिया."
"गनीमत समझो, फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी ही किया, फ़िफ़्टी परसेंट ही आई, अगर सौ फीसदी जनता निकल पड़ी तो इन नेताओं का क्या होगा."