दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनाव करवाना अपने आपमें एक चुनौती ही है. न केवल व्यवस्था की दृष्टि से बल्कि खर्च की दृष्टि से भी.
जहाँ तक ख़र्च का सवाल है तो यह ख़र्च लगातार बढ़ता ही जा रहा है.
सेंटर फार मीडिया स्टडीज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार जहां 1999 के चुनावी प्रक्रिया पर 880 करोड़ रुपए का खर्चा आया था, वहीं 2004 में पांच चरणों में कराये जाने वाले मतदान पर निर्वाचन आयोग कुल 1200 करोड़ रुपए खर्च करेगा.
इस रिपोर्ट के अनुसार हर भारतीय पर जो कि मतदान में भाग ले सकता है, व्यक्तिगत खर्च 75 रुपए आता है.
भारत में इस समय 675 करोड़ मतदाता पंजीकृत हैं. अगर सिर्फ उन लोगों का हिसाब लगाया जाए जो कि वस्तुतः अपने मताधिकार का प्र्योग करते हैं, तो यह रकम बढ़ कर 125 रुपए प्रति व्यक्ति हो जाती है.
कितना खर्च 1991 - 359 करोड़ रुपए 1996 - 597 करोड़ रुपए 1998 - 666 करोड़ रुपए 1999 - 880 करोड़ रुपए 2004 - 1200 करोड़ रुपए |
इन पर आयोग कुल खर्च का तकरीबन पांचवां हिस्सा खर्च करता है.
इसके साथ ही खर्चा का पांचवा हिस्सा मतदान केन्द्रों में नियुक्त कर्मचारियों पर खर्च किया जाता है.
इस बार आयोग ने मतदाताओं को वोटिंग मशीनों को इस्तेमाल का तरीका समझाने और अपने अधिकार का प्रयोग करने संबंधी विज्ञापनों पर कुल एक करोड़ रुपया और खर्च किया.
परंतु रिपोर्ट में कहा गया है कि इन विज्ञापनों के बावजूद मत डालने वालों की संख्या में कोई ख़ास वृद्धि नहीं हुई.
प्रत्याशियों का खर्च
इस वर्ष 1999 के मुकाबले प्रत्याशियों द्वारा अपने चुनाव प्रचार पर खर्च की जाने वाली रकम के दुगना होने के भी आसार हैं.
आयोग द्वारा ये राशि केवल 25 लाख रुपए तक की गई है.
पिछले चुनावों में भाग ले रहे प्रत्याशियों ने लगभग 55 करोड़ रुपए प्रचार पर व्यय किए गए थे.
एक अनुमान है कि ज़्यादातर प्रत्याशी सबसे ज़्यादा खर्च समाचार पत्रों और टीवी, रेडियो पर दिए जाने वाले विज्ञापनों पर करते हैं, और उनके कुल खर्च का सिर्फ एक तिहाई ही क्षेत्र में दौरे करने, गाड़ियां भाड़े पर लेने या कार्यकर्त्ताओं पर खर्च होता है.
निर्वाचन आयोग ने कुछ समय पहले चुनाव प्रचार पर खर्च की सीमा बढ़ाई थी.
फिर भी देश में लगभग सौ ऐसे संसदीय क्षेत्र हैं जहां प्रत्याशियों ने 10 लाख रुपए से ज़्यादा खर्च किए हैं.
एक अनुमान है कि 50 क्षेत्रों में यह रकम एक करोड़ रुपए तक को छू गई है.