तिहत्तर वर्ष के अहमद नासिर ओमान के हैं.
मुंबई के पाँच सितारा हिन्दूजा अस्पताल से आज उनकी छुट्टी हो रही है. लेकिन वे घर नहीं लौट रहे हैं. वे और उनके बेटे अभी मुंबई की सैर करने वाले हैं.
वे ‘मेडिकल टूरिज़्म’ या स्वास्थ्य पर्यटन स्कीम का लाभ उठा रहे हैं जिसका प्रचार कई राज्य सरकारें कर रही हैं. महाराष्ट्र सरकार उन राज्यों में से एक हैं.
‘फ़िक्की’ या फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैम्बर्स ऑफ़ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज़ विदेशों में, विशेषकर पश्चिमी देशों में स्वास्थ्य पर्यटन के प्रचार में राज्य सरकार को सहायता दे रहा है. इस का फ़ायदा भी हो रहा है.
भारत के निजी अस्पतालों में 15 से 20 प्रतिशत मरीज़ पश्चिमी देशों से इलाज कराने आ रहे हैं.
अपोलो हॉस्पिटल और हिन्दूजा हॉस्पिटल में पश्चिमी देशों से सबसे अधिक संख्या में मरीज इलाज कराने आ रहे हैं.
महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाई गई ‘मेडिकल टूरिज़्म’ काँसिल के सेक्रेटरी अनुपम वर्मा जो हिन्दूजा हॉस्पिटल के एक बड़े अधिकारी भी हैं, कहते हैं, ‘भारत के निजी अस्पतालों में पश्चिमी देशों के टक्कर की सुविधाएं उपलब्ध हैं लेकिन उन देशों के मुकाबले यहां इलाज पाँच गुना कम खर्च में हो जाता है.’
वे कहते हैं, ‘स्वास्थ पर्यटन धीरे-धीरे बढ़ रहा है. हमने इसे नवंबर 2003 में शुरु किया था. हम इसका विदेशों में भरपूर प्रचार कर रहे हैं ताकि लोग हमारे देश के अस्पतालों में उलपलब्ध बेहतरीन सुविधाओं का सस्ते दामों पर उपयोग कर सकें.’
भारत के सबसे महंगे निजी अस्पतालों में दिमाग के ऑपरेशन पर पाँच हज़ार अमरीकी डालर खर्च ही करना पड़ेगा, परंतु इस ऑपरेशन पर अमेरिका या इंग्लैंड में 50 हज़ार डालर का ख़र्च आएगा.
शायद इसीलिए अमेरिका की कई बीमा कंपनियाँ मरीज़ों को ऑपरेशन के लिए भारत भेज रही हैं.
लेकिन निजी अस्पतालों के अधिकारी कम खर्च के साथ सुविधाओं पर भी बल देते हैं.
अभी हाल में ही कैंसर की एक पाकिस्तानी मरीज़ को वहां के डाक्टरों ने भारत में इलाज कराने की सलाह दी.
इसका कारण ‘गामा किंग’ नाम का एक ऐसा औजार जो भारत में केवल तीन अस्पतालों में है और पड़ोस के देशों में कहीं नहीं.
अस्पतालों की छवि
लेकिन समस्या ये है कि जितनी संख्या में पश्चिमी देशों के रोगियों को भारत में इलाज के लिए आना चाहिए वे उतनी संख्या में नहीं आ रहे हैं.
इसका मुख्य कारण विदेशों में अब भी भारतीय अस्पतालों की खराब छवि.
वे कहते हैं भारत में अस्पतालों की दशा बहुत बुरी है और वहां के डाक्टरों ने स्वास्थ्य को एक पेशा बना लिया है.
अमरीका से आये ब्रिन वुड इलाज के लिए मुम्बई जरूर आएं हैं लेकिन किसी ऑपरेशन के लिए नहीं बल्कि मानसिक सुकून के लिए. वे शहर के केरला आयुर्वेदिक मालिश केन्द्र से आयुर्वेदिक मसाज या मालिश कराने आए हैं इसके बाद वे केरला भी जाएंगे ताकि वहां की कुदरती सुंदरता का आनंद ले सकें.
वे कहते हैं, ‘ऑपरेशन कराने की कभी जरुरत पड़ी तो मैं अमेरिका में ही कराऊंगा, ज़्यादा खर्च ही क्यों न उठाना पड़े. मैं केरल आयुर्वेदिक मसाज कराने आया हूं ताकि अपनी शारीरिक और मानसिक थकावट को दूर कर सकूं और साथ ही केरल की सैर कर सकूं.’
आरोप-प्रत्यारोप
लेकिन भारतीय अस्पताल वालों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों के कारण छवि खराब है जिसको दूर करने का प्रयास निजी अस्पताल वाले कर रहे हैं.
स्वास्थय पर्यटन के और भी कई आलोचक हैं.
रवि दुग्गल स्वास्थ्य से जुड़ी एक संस्था से जुड़े हैं.
लेकिन निजी अस्पतालों के अधिकारी का मानना है कि कई ऐसे मरीज हैं जो ऑपरेशन के बाद काम पर वापस नहीं जा सकते, परंतु वे शहर में सैर के योग्य होते हैं.
ऐसे ही लोगों के लिए ये योजना तैयार की गई है.
अनुपम वर्मा के विचार में अगले तीन चार सालों में ब्रिटेन और अमेरिका के सरकारी अस्पतालों के मरीज भी वहां इलाज कराने आएंगे, क्योंकि उन देशों में एक मरीज की ऑपरेशन के लिए एक साल से अधिक इंतजार करता पढ़ता है और फिर भारत में जितना कम खर्च में इलाज हो सकता उतना उन देशों में कभी नहीं हो पाएगा.