रविवार, 02 मई, 2004 को 08:45 GMT तक के समाचार
योगेंद्र यादव
चुनाव विश्लेषक
उत्तरांचल से तुलना करके देखें तो हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस बेहतर स्थिति में लगती है.
गुजरात दंगों और चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद जब यहां विधानसभा चुनाव हुए तब भाजपा की जीत तय सी मानी जा रही थी.
पर 2002 के इस चुनाव में कांग्रेस ने आराम से जीत हासिल की.
इससे उसे न सिर्फ़ 41 फीसदी वोट मिले थे बल्कि भाजपा से पाँच फीसदी बढ़त भी मिली थी. तब सुखराम की हिमाचल विकास पार्टी अलग थी और कुछ मतों में वह तीसरे नंबर थी.
उसे ज़्यादा सीटें नहीं मिलीं पर मंडी क्षेत्र में सुखराम का जादू बरकरार रहा.
सुखराम
इस बार सुखराम कांग्रेस में आ गए हैं और इससे कांग्रेस की स्थिति मजबूत होनी चाहिए.
अगर सुखराम की पार्टी को मिले वोट कांग्रेस खाते में जुड़ जाते हैं तब तो वह आराम से राज्य की सभी चारों लोकसभा सीटें जीत लेगी.
अगर कांग्रेस के दो फीसदी वोटर दूसरी तरफ जाते हैं तब उसके खाते से एक सीट निकलेगी.
यहाँ कांग्रेस काफी मज़बूत है और उसका आधार कमज़ोर नहीं हुआ है - जैसा कि मुल्क के काफ़ी सारे इलाकों में हो चुका है.
फिर राज्य का चुनावी इतिहास भी यह रहा है कि यहां का मतदाता राज्य में शासन करने वाली पार्टी को ही लोकसभा चुनाव में भी पसंद करता है.
1996 के कांग्रेस विरोधी लहर में भी इसी चलते कांग्रेस राज्य की चारों सीटें जीत गई थी.
इस बार फिर कांग्रेस सत्ता में है और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के लिए काफी कुछ दाँव पर है.
स्वयं उनकी पत्नी मंडी सीट से चुनाव लड़ रही है यहां से पहले सुखराम जीतते थे. यों राज्य में कांग्रेस की स्थिति सुखद लगती है.
सामाजिक गणित
चुनाव के संदर्भ को छोड़ भी दें तो उत्तरांचल और हिमाचल दोनों राज्यों का सामाजिक गणित एक सा चलता है.
इन दोनों में पिछड़ों की आबादी बहुत कम है और ब्राह्मणों तथा राजपूतों का ही बहुमत है.
आम तौर पर अगड़ों के बहुमत से भाजपा को खुश होना चाहिए क्योंकि उत्तर भारत में वही अगड़ों की पसंद है.
पर राजनीति का सिद्धांत है कि कोई भी बड़ा समूह एकजुट या समान नहीं रह पाता.
कांग्रेस ने इन राज्यों के अगड़ों में अपना कुछ आधार बरकरार रखने के साथ बाक़ी जमातों को साथ लिया है.
भाजपा को अगड़ों में बढ़त तो है लेकिन अन्य राज्यों की तरह वह अगड़ों की अकेली पार्टी नहीं है.
इन दोनों राज्यों में ग़रीब कांग्रेस के साथ हैं तो खाते-पीते लोगों में भाजपा के प्रति ज़्यादा रुझान है.
ये सामाजिक समीकरण बहुत ज़्यादा तो नहीं बदलते पर इनमें जरा भी बदलाव नतीजों में काफी फर्क ला सकता है.
पहले दो दौर के एक्जिट पोल के बाद भाजपा को अब अपनी हरेक सीट बचाने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है.
ऐसी स्थिति में इन दो राज्यों की ये नौ सीटें खासी महत्वपूर्ण हो जाती हैं लेकिन भाजपा के लिए अपनी सीटें बचानी आसान नहीं हैं.