जम्मू कश्मीर में पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी सिर्फ़ 16 सीटों के बलबूते पर सरकार चला रही है.
पीडीपी को काँग्रेस ने समर्थन दिया हुआ है. राज्य के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच लोगों को एक दूसरे से मिलने-जुलने का मौक़ा मिलने से कश्मीर मसले के समाधान में मदद मिलेगी.
हमने चुनाव के मौक़े पर मुफ़्ती मोहम्मद सईद से ख़ास बातचीत की.
बहुत से लोगों से आपकी सरकार के बारे में बातचीत की. लोग आपकी सरकार से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें आपसे बहुत शिकायतें हैं.
लोगों की सारी उम्मीदें पूरी नहीं हो सकती हैं. लोगों को हमसे बहुत अपेक्षाएँ हैं. आप देख ही रहे हैं कि हिंसक वारदातों के बावजूद लोगों में कितनी राहत है, लोग कितना सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. चुनावी मुहिम चल रही है और लोग हज़ारों की संख्या में रैलियों में आ रहे हैं, हिस्सा ले रहे हैं. लोगों की अपेक्षाएँ हैं इसलिए वो गिला कर सकते हैं लेकिन किसी के हाथ में अलादीन का चिराग़ नहीं है.
लोगों की कौन सी उम्मीदें आपकी नज़र में पूरी हुई हैं.
सबसे बड़ी समस्या यहाँ युवाओं के रोज़गार की है, वो लाखों की संख्या में हैं, यहाँ कोई उद्योग नहीं है. हम कुछ ज़्यादा तो नहीं कर पाए, कोई 40 हज़ार शिक्षित नौजवानों को नियम के अनुसार, जो उनका हक़ था, वो हमने उनको दिया है.
क्या आपको लगता है कि लोगों में, ख़ासकर नौजवानों में जो नाराज़गी है, उसकी वजह से आपको इन चुनावों में नुक़सान उठाना पड़ सकता है.
नुक़सान मैं नहीं कहूँगा. अभी तो केवल 16 महीने का कार्यकाल पूरा किया है, विधानसभा तो छह साल की होती है. और फिर हमारी संख्या भी 16 की ही है जबकि सदन 90 सीटों का है, उसको भी चलाना बड़ा मुश्किल होता है.
दोस्ती का मौहाल
भारत-पाकिस्तान के बीच जो बातचीत चल रही है, उसके उसकी वजह से माहौल में जो बदलाव आया है, उसका कितना असर इन चुनावों पर पड़ रहा है.
यह तो बहुत ही अच्छा माहौल है, मेरा ख़याल है कि अगर ये गाड़ी आगे चली और ये शुरु में कामयाब हो जाएँगे, तो यह बहुत सारी बीमारियों का इलाज साबित होगा. मुझे लगता है, ये बड़ा मुश्किल काम है और पहले के कई अनुभव भी है.
![]() "मेरे पास अलादीन का चिराग़ नहीं है" |
इस सफलता का कितना श्रेय आप केंद्र सरकार को देंगे और कितना अपनी सरकार को.
मेरा ख़याल है कि इसका श्रेय कश्मीर की जनता को देना चाहिए जिन्होंने चुनाव के पहले एक संदेश दिया है. प्रधानमंत्री ख़ुद यहाँ आए और यहीं से उन्होंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया जिसका पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मीर ज़फ़रुल्ला ख़ाँ जमाली ने काफ़ी सकारात्मक जवाब दिया क्योंकि जब भी टकराव की स्थिति आई है, सबसे ज़्यादा नुक़सान यहीं के लोगों को उठाना पड़ा है.
सबसे बड़ा मसला, जिसे प्राथमिक मानते हुए हल करना चाहिए, वो क्या है.
मेरा ख़याल है कि सबसे पहले आपस में विश्वास पैदा करने की ज़रूरत है. फिर जो तकनीकी वजहें हैं, वो धीरे-धीरे दूर हो जाएँगी.
कोई फ़ार्मूला नहीं है, यह बार-बार कहा जाता है, क्या आपकी तरफ़ से भी कोई सुझाव है.
नहीं, देखिए यह एक प्रक्रिया की बात है और बातचीत के ज़रिए आहिस्ता-आहिस्ता चीज़ें हल होंगी.
आपने कहा कि आहिस्ता-आहिस्ता चीज़ें हल होंगी, क्या आप इस बदलाव के क्रम को बतला सकते हैं. आपके दिमाग़ में इसको लेकर क्या कोई रोडमैप है और आपकी सरकार इस बारे में क्या सोचती है.
जैसे उन्होंने किया है, मसलन, हवाई, रेल और बस सेवाओं का चालू किया जाना, वाघा बॉर्डर और राजस्थान की तरफ़ से आने-जाने की इजाज़त, हम समझते हैं कि जब तक कश्मीर समस्या का कोई हल हो, लोगों को आपस में मिलने का मौक़ा तो मिले. मेरे ख़याल में यह सबसे ज़्यादा विश्वास क़ायम करेगा.
लेकिन जब पीडीपी लोगों के बीच जाती है और लोग पूछते हैं कि कश्मीर के मसले पर आपका सोचना क्या है, तो आप क्या कहते हैं.
हम यही कहेंगे कि इस मसले के हल की तरफ़ बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं और ये केवल कहने से नहीं होगा.
लेकिन वो हल क्या है.
किसी को नहीं मालूम.