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वाजपेयी बनाम कृष्णा है कर्नाटक में

दक्षिण भारत के चार राज्यों में कर्नाटक ही ऐसा प्रदेश है, जहाँ भारतीय जनता पार्टी का कुछ प्रभाव है और इस कारण भाजपा, कर्नाटक को दक्षिण का प्रवेश द्वार कहती है.

1999 के लोकसभा चुनाव में 28 में से सात सीटें भाजपा के खाते में गई थीं.

भाजपा अब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की छवि और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सफलताओं के आधार पर कर्नाटक में अपना समर्थन जुटाने में लगी है.

भाजपा दो प्रमुख समुदाय- पिछड़ी जाति के लिंगायत और मुसलमानों को लुभाने में लगी है.

पिछड़े समुदाय

लिंगायत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री लोकशक्ति के नेता, रामकृष्ण हेगड़े के निधन के बाद, लिंगायत समुदाय खुद को असहाय महसूस कर रहा है.

साथ ही उनका मानना है कि कांग्रेस पार्टी के कार्यकाल में लिंगायत समुदाय को दरकिनार किया गया.

कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय के अलावा एक और पिछड़ी जाति, वोक्कालिगा समुदाय का बड़ा प्रभाव है. इन दोनों समुदायों में से एक का समर्थन बहुत आवश्यक है.

कर्नाटक के उत्तरी जिलों में सफ़र कर और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से मिलकर यह साफ़ हो गया है कि लिंगायत का एक बड़ा तबका भाजपा के साथ है.

मुस्लिम

मुसलमानों को लुभाने के लिए तो भाजपा पूरी तरह से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की छवि पर निर्भर है.

पिछले महीने उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भारत उदय यात्रा के दौरान उन ज़िलों का दौरा किया था जहाँ मुसलमानों की संख्या भी अधिक है.

राजग के एजेंडे और अल्पसंख्यकों के लिए अपने कार्यक्रम के आधार पर भाजपा मुसलमानों से वोट माँग रही है.

हालांकि गुजरात दंगों के बाद आम मुसलमान भाजपा को शक की नज़र से देखता है. मगर नौजवानों की राय कुछ हट कर है.

बेल्लारी और दाँवगरे जिलों में कुछ नौजवानों ने बताया कि वे वाजपेयी के समर्थन में भाजपा को वोट देंगे.

मुसलमान मतदाता ये मानते हैं कि वाजपेयी पर भरोसा किया जा सकता है लेकिन भाजपा पर नहीं.

यही वजह है कि भाजपा का सारा चुनाव प्रचार वाजपेयी पर केंद्रित है.

राज्य का नेतृत्व

हालाँकि उनके सामने ये परेशानी भी है कि राज्य में भाजपा का नेतृत्व कौन करेगा.

एसएम कृष्णा
एसएम कृष्णा के नाम पर ही कांग्रेस विधानसभा का चुनाव लड़ रही है

भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस गठबंधन पर लगातार दबाव डालती रही है कि वह प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करे लेकिन भाजपा का राज्य में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार अभी तय नहीं है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार को पिछले साल राज्य भाजपा इकाई का नेता चुना गया था मगर अनंत कुमार ब्राह्मण हैं और पार्टी के दिग्गज, येदीरुप्पा के साथ मतभेद चल रहे हैं.

येदीरुप्पा लिंगायत नेता हैं लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अनंत कुमार के साथ है.

शायद यही वजह है कि भाजपा ने राज्य में अपने मुख्यमंत्री पद के दावेदार का नाम अभी तक घोषित नहीं किया है.

दूसरी ओर, कांग्रेस के नेता और मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा, ने चुनाव फिर जीतने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दी है.

क़रीब पाँच साल सत्ता में रहने के बाद, कृष्णा अपनी सरकार की सफलताओं पर वोट माँग रहे हैं.

दिलचस्प बात यह है कि कर्नाटक में कांग्रेस का अभियान मुख्यमंत्री कृष्णा पर आधारित है. यहाँ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के नाम पर वोट नहीं माँगा जा रहा है.

राज्य मे व्यापक सूखा, तेलगी घोटाला, लॉटरी घोटाला आदि चुनावी मुद्दे हैं लेकिन कृष्णा के नेतृत्व और सफलताओं पर कांग्रेस पाँच साल और माँग रही है.

सवाल यह है कि क्या 1977 की तरह मतदाता इस बार भी विधानसभा और लोकसभा में अलग-अलग तरह से वोट देंगे. पहले चरण के मतदान के बाद ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं मगर देखना यह है कि क्या 26 अप्रैल के मतदान में भी यह रुझान बरकरार रहता है.