सन् 80 के चुनाव में इंदिरा गाँधी को मिला वोट नकारात्मक वोट था. जनता पार्टी के ख़िलाफ़.
एक तो जनता पार्टी के नेताओं को लेकर जनता का विश्वास चला गया था और दूसरे सारे बड़े नेताओं की छवि बिगड़ गई थी.
ऐसा कोई भी नेता नहीं था जिस पर लोग विश्वास करते.
मोरारजी देसाई राजनीति से हट गए थे, जगजीवन राम ने अपनी पार्टी बनाई फिर वे कांग्रेस में चले गए. चौहान भी धीरे धीरे कांग्रेस की ओर जा रहे थे.
जनसंघ वालों ने भारतीय जनता पार्टी बनाई और समाजवादी अलग चले गए.
इन्हीं सब के बीच कांग्रेस की जीत हुई और इंदिरा गाँधी सत्ता में वापस लौटीं.
राजीव और उनकी विफलता
इंदिरा गाँधी की दर्दनाक हत्या के बाद कांग्रेस ने पुरानी परंपरा का पालन किया और उसी खानदान से नेता चुनने के क्रम में राजीव गाँधी को नेता चुन लिया गया.
ऐसा कोई नेता पार्टी में था भी नहीं जिस पर सारे कांग्रेसी विश्वास करके उसके साथ चल पाते. इसलिए उनका विरोध भी नहीं हुआ कि उन्हें अनुभव नहीं है.
राजीव गाँधी की कई बातों की सराहना करनी चाहिए जिसमें से एक तो यह है कि उन्होंने देश में कंप्यूटर क्रांति की शुरुआत की और विज्ञान की चर्चा शुरु की. हालांकि पंडित नेहरु के ज़माने में भी इसकी चर्चा होती थी.
राजीव गाँधी विफल हुए तो इसका कारण उनकी अनुभवहीनता थी.
इतने बड़े देश को समझने और लोगों को साथ लेकर चलने के लिए अनुभव की ज़रुरत होती है.
इससे यह भ्रम भी टूटा कि देश को चलाने के लिए अनुभव की कोई ज़रुरत ही नहीं होती.
जहाँ तक उनके सलाहकारों का सवाल है तो सलाहकार तो सभी के होते हैं. हमारे यहाँ कहावत है कि जैसा राजा होता है वह वैसा ही सलाहकार चुनता है.
लेकिन राजीव गाँधी की विफलता के लिए उनके सलाहकारों को दोष देना ठीक नहीं है.