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वाकई ज़मीन से जुड़ा एक उम्मीदवार

तीन बार विधायक और तीन बार सांसद रहने के बाद क्या आप इस बात को संभव मानते हैं कि ऐसे व्यक्ति के कमरे में पंखा न हो और वह जमीन पर दरी बिछाकर सोता हो.

68 वर्षीय एके रॉय से जब हम धनबाद में उनके कार्यालय पहुंचे तो कुछ थके से वे प्रचार से लौटे ही थे.

कोयले से सने कुर्ता-पायजामा पहने, पैर में चप्पल और कंधे पर लाल झोला लिए उन्होंने दिन भर एक मोटरसाइकिल पर प्रचार किया.

हमारे बैठने के लिए उन्होंने स्वयं झाड़ू से कुर्सियां साफ़ की और तपती धूप में लोगों से मिलकर उनकी बाते सुनने के बारे में हमें बताया.

रॉय ऐसे नेता है कि जिनके पास संपत्ति के नाम पर एक पुराना स्कूटर है और उनका घर ख़र्च अखबारों में लेख और किताबें लिखकर निकलता है.

जनता की सेवा का मन बना चुके रॉय ने विवाह नहीं किया.

उन्होंने दो बार (सिंदरी) विधानसभा सीट से चुनाव मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर लड़ा.

फिर वैचारिक मतभेद के कारण 1972 में उन्होंने किसान संग्राम समिति के बैनर तले चुनाव लड़ा. बाद में इस संगठन को मार्क्सवादी समन्वय समिति का नाम दिया गया.

जय प्रकाश आंदोलन में वे शामिल हुए, जेल भी गए और 1977 में जेल से ही लोकसभा चुनाव जीता.

चुनावी ख़र्च

फिर 1980 और 1989 में भी लोकसभा चुनाव जीते. आज जब धनबाद में प्रचार बड़ी मात्रा में पैसे ख़र्च हो रहे हैं, एके रॉय इस ख़र्च का विरोध करते हैं.

रॉय चाहते हैं कि धनबाद का धन बाहर न जाए

उनका कहना है, "ख़र्च की सीमा बढ़ाने का मैने विरोध किया. मेरा मानना है कि चुनाव में ख़र्च का हिसाब ही नही, धन कहां से आया उसका ब्यौरा भी दिया जाना चाहिए."

एके रॉय चाहते हैं कि झारखंड का विकास नीचे से शुरू हो और धनबाद का धन बाहर न जाए.

वे भाजपा और कांग्रेस दोनो की आर्थिक नीतियों का विरोध करते हैं और कहते हैं कि 'हम लोगों का मुद्दा आर्थिक आज़ादी बनाम आर्थिक ग़ुलामी है. भाजपा और कांग्रेस की नीतियां देश को आर्थिक ग़ुलामी की ओर धकेल रहे हैं. '

वे पूर्व सांसद होने के नाते मिलने वाले किसी भी सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते और न ही पेंशन लेते हैं. कुल मिलाकर चुनावी शोर और तामझाम से दूर ये अपनी तरह से अपने लोगों के बीच जा अपनी बात कह रहे हैं.