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भिलाई इस्पात संयंत्र का विनिवेश भी मुद्दा

देश के नौ रत्नों में से एक भिलाई इस्पात संयंत्र भी भारत सरकार की विनिवेश सूची में है और यही बात इस लोकसभा चुनाव में मुद्दा भी बना है.

कम से कम उन 38 हज़ार कर्मचारियों और उनके परिवारवालों के लिए तो यह एक संवेदनशील मुद्दा है ही.

पिछले तीन सालों में स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (सेल) प्रबंधन ने अपनी कार्रवाइयों से साफ़ कर दिया है कि वह भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) को निजी हाथों में बेचने की तैयारी कर रहा है.

हालांकि सेल प्रबंधन और सरकार की ओर से कभी भी यह स्पष्ट रुप से नहीं कहा गया कि विनिवेश होने वाला है.

लेकिन जिस तरह से भिलाई टाउनशिप के मकान कर्मचारियों को बेच दिए गए उससे कर्मचारियों के मन में कोई संदेह अब नहीं है.

कर्मचारियों के लिए ऐच्छिक सेवानिवृति जैसी योजनाएँ भी इसी का हिस्सा हैं.

राजनीतिक विरोध

बीएसपी के कर्मचारी तो इसका विरोध कर ही रहे हैं राजनीतिक दलों के स्थाई नेता भी कह रहे हैं कि वे निजीकरण के पक्ष में नहीं हैं.

सबसे मुखर विरोध कांग्रेस के विधायक और दुर्ग लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार भूपेश बघेल कर रहे हैं.
भूपेश बघेल
दुर्ग से कांग्रेस प्रत्याशी भूपेश बघेल विनिवेश का मुखर विरोध कर रहे हैं

वे भिलाई टाउनशिप को भी बेचने के ख़िलाफ़ थे.

उन्होंने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा, ‘बीएसपी सेल का सबसे कमाऊ पूत है और इसी को बेच देना तो सरासर ग़लत है. यह तो क्षेत्र की जनता को धोखा देने जैसा है.’

वे कहते हैं कि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में भी कहा है कि फ़ायदे वाली इकाइयों का विनिवेश हरगिज़ नहीं होना चाहिए.

भाजपा के नेता बीएसपी के विनिवेश का विरोध तो करते हैं लेकिन वे अपनी सरकार की नीतियों के चलते यह नहीं बता पाते कि किस आधार पर बीएसपी का विनिवेश रुकेगा.

कर्मचारियों का पक्ष

बीएसपी ने इस बार 22 सौ करोड़ रुपयों का लाभ कमाया है और वह स्वाभाविक तौर पर सेल की सबसे अधिक कमाने वाली इकाई है.

लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि कभी सबसे अच्छा वेतन-भत्ता पाने वाले बीएसपी के कर्मचारी अब सबसे ख़राब वेतन-भत्ता पाने वाले कर्मचारी हो गए हैं.

पिछले पच्चीस सालों से वहाँ काम कर रहे एक कर्मचारी ने कहा, ‘हमारे सारे भत्ते बंद कर दिए गए हैं और अब हम सिर्फ़ वेतन और डीए के हक़दार रह गए हैं.’

उनका कहना है कि विनिवेश की आशंका से कर्मचारी इतने परेशान और डरे हुए हैं कि वे न तो भत्तों के बंद होने पर कुछ कहते हैं और न काम के घंटे बढ़ाए जाने पर.

एक दूसरे कर्मचारी का कहना था कि भत्ता आदि बंद करके ही प्रबंधन कोई बारह सौ करोड़ रुपए साल के बचा रहा है और यह निजीकरण से पहले संयंत्र को ज़्यादा लाभ में दिखाने की साजिश है.

यहाँ तक कि ट्रेड यूनियनें भी इस मामले में ख़ामोश ही हैं.

दो दशक पहले और अब के भिलाई को देखकर साफ़ लगता है कि बहुत कुछ बदल गया है और भिलाई टाउनशिप की रौनक और चमक लगातार धुँधली पड़ती जा रही है.

पता नहीं निजीकरण इसकी चमक को कितना लौटा पाएगा.