(बिंदास बाबू की डायरी)
बीबीसी के पाठकों, ये लो, पहली बार हिंदी फिल्मों की प्राचीन हीरोइन ने ग़रीबी देखी. ग़रीबी भी निगोड़ी ऐसी आकर्षक लगी कि वे देर तक देखती निहारती रहीं.
कोलकाता में इतने दिन रहते हुए नहीं दिखी. जब से चुनाव में उतरी हैं, तब से ग़रीबी के पास जाना पड़ रहा है.
जाते ही ग़रीबी मुस्कुराने लगती है, कहती है, ''हैलो, हाय मौसमी आँटी, मौसमी नाम की हो कि काम की. मेरे बालक ने कभी एक मौसमी का रस तक नहीं चखा.''
मौसमी को ग़रीबी, भुखमरी, बदहाली देख कष्ट हो जाता है. वे थक जाती हैं, गरमी है, सामने ग़रीबी है, ग़रीबी में वोट है, वोट लेना है, गरीबी को फ़ेस करना है.
एक सुबह कूड़ा बीनती गरीबी बिंदास बाबू को मिली. बोली, ''महाराज- अब तक तो हमारे दर्शन स्पर्शन करने नेता आते थे, अब अभिनेता आने लगे हैं.''
''वे भाषण देकर कहते थे, हे ग़रीबी, अब मैं तुझे दूर करके रहूँगा. धमकी देते थे, चले जाते थे, हम मन ही मन मुस्कुराती रहती थीं.''
वे ख़ुद ही दूर हो जाते थे. इस तरह ग़रीबी भी दूर हो जाती थी. हर पाँच साल बाद ग़रीबी और नेताओं की यही आँख-मिचौली, छुपाछुपाई चलती रहती थी.
जबसे अभिनेता-अभिनेत्री आए हैं, ग़रीबी का स्वाद बदल गया है, वे गाकर नाचकर कहते हैं, ''हे ग़रीबी, तू छुपी है कहाँ, मैं तड़पता यहाँ, तेरे बिन सूना-सूना है दिल का जहाँ.'' दूसरा गाता है, ''मैं यहाँ तू कहाँ.'' मौसमी भी गा रही थीं.
ग़रीबी ने पुचकार कर कहा, ''आँटी-आँटी, ज्यादा मत चीख पुकार करो. ज़्यादा पास आईं तो इन्फैक्शन हो जाएगा. हेपेटाइटिस बी, एड्स, टीबी, काला अजार, हैज़ा, कुछ भी.''
''तब तुम कैसे कहोगी, हैलो ग़रीबी, हाय ग़रीबी, हाऊ अट्रैक्टिव.''
ग़रीबी से मुलाकात कर मौसमी आँटी खिलखिलाकर हँस पड़ीं.
बीबीसी के पाठकों, एक ठो ग़रीबी बचा के रखना, इन दिनों बड़ी कीमत है उसकी.