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नक्सलियों की धमकी और चुनौती

बस्तर के आदिवासी इलाक़ॉ में इस लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों को एक बार फिर नक्सलियों की चुनाव बहिष्कार की धमकी से दो-चार होना पड़ रहा है.

वैसे तो पिछले दो दशकों से नक्सली लगभग हर चुनाव में बहिष्कार की धमकी देते आए हैं लेकिन पुलिस भी मानती है कि इस बार ये ज़्यादा गंभीर है.

मतदान के दौरान यहाँ किस तरह हिंसा होने की आशंका है इसका अंदाज़ा पिछले दो दिनों में हुए पच्चीस से अधिक बारुदी विस्फोटों और लगातार हो रही गोलीबारी से लगाया जा सकता है.

गाँव खाली

बीस अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए जगह-जगह से पुलिस दल बस्तर के दुर्गम इलाकों के लिए पाँच दिन पहले ही रवाना किए जा चुके हैं. आख़िर उन्हें 35-40 किलोमीटर की पैदल यात्रा भी तो करनी है.

राज्य सरकार भले ही इस तथ्य को न माने लेकिन छत्तीसगढ़ के कई ज़िलों में नक्सलियों की सामानांतर सत्ता चलती है जिसमें बस्तर के तीनों ज़िले बस्तर, दंतेवाड़ा और कांकेर शामिल हैं.

चाहे विधानसभा चुनाव हों या लोकसभा चुनाव, प्रत्याशी तो यूँ भी बस्तर के दुर्गम जंगलों में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते और पार्टी के कार्यकर्ताओं के भरोसे रहते हैं.

लेकिन इस बार पार्टी कार्यकर्ताओं ने भी चुनाव प्रचार के लिए माफ़ी माँग ली है.

बहुचर्चित अबूझमाड़ के मुहाने पर बसे क़स्बे नारायणपुर के एसपी के कार्यालय में बीबीसी से बात करते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अबूझमाड़ के कई गाँव नक्सलियों की धमकी के चलते खाली हो चुके हैं.

इस अधिकारी का कहना है ‘इस बार तो इन ग्रामीणों का वोट डाल पाना असंभव ही दिखता है.’

इसका कारण भी है.

कारण

दरअसल पिछले विधानसभा चुनाव के परिणामों ने न केवल अजीत जोगी और कांग्रेस को सकते में डाला बल्कि नक्सली भी इससे सदमे में आ गए.
बस्तर के ग्रामीण
स्थानीय लोग कहते हैं कि इस बार नक्सलियों और प्रशासन के बीच आर-पार की लड़ाई हो सकती है

विधानसभा चुनाव में आदिवासी सीटों पर नक्सलियों का ख़ासा प्रभाव है, वहाँ एक तो मतदान का प्रतिशत बहुत अधिक था और दूसरे उन सभी सीटों पर कांग्रेस हार गई.

बाद में मीडिया से बात करते हुए नक्सली नेताओं ने आरोप लगाए थे कि केंद्र की भाजपा सरकार ने वहाँ सुरक्षा बलों का दुरुपयोग करके फ़र्जी मतदान करवाया.

हालांकि सरकार की ओर से इस आरोप को बेबुनियाद ठहराया जा चुका है.

लेकिन इस बार नक्सलियों ने न सिर्फ़ चुनाव बहिष्कार को गंभीरता से लागू करने का निर्णय लिया है बल्कि उनकी ओर से हर हाल में भाजपा को हराने की अपील की गई है.

इस बीच नक्सलियों ने हिंसक वारदातें बढ़ा दी हैं ख़ासकर पुलिस बलों पर हमला.

आर-पार?

इस बार नक्सलियों ने पहले से संकेत दे दिए हैं कि चुनाव के दौरान बस्तर में बड़ी हिंसक वारदातें हो सकती हैं.

इसका एक उदाहरण यह है कि उन्होंने रामकृष्ण मिशन को पहले से कह दिया है कि वे अबूझमाड़ के अपने स्कूलों से बच्चों को हटा लें क्योंकि इस बार हिंसा की घटनाओं को टालना उनके लिए असंभव होगा.

मिशन अबूझमाड़ में पाँच स्कूल चलाता है और पाँचों स्कूलों को बंद करके हॉस्टल में रहने वाले सभी बच्चों को मुख्यालय नारायणपुर लाया जा चुका है.

मिशन के एक अधिकारी कहते हैं, ‘इस बार नक्सलियों और सरकार दोनों के लिए मामला आर-पार का दिखता है.’

बहरहाल बस्तर की तमाम चुनावी गर्मी साप्ताहिक हाटों और सड़क से सटे गाँवों तक ही सीमित है.

20 अप्रैल को होने वाले मतदान यह भी तय करेंगे कि नक्सलियों की ताक़त कितनी है और सरकार उनसे निपटने में कितनी सक्षम है.