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94 साल का उम्मीदवार मैदान में

उम्र है 94 साल लेकिन राजनीति में सक्रिय रहने का जोश बरक़रार है.

ये हैं बीदर के सांसद रामचंद्र वीरप्पा जो इस बार फिर आम चुनाव में उम्मीदवार हैं.

घर-घर पैदल जाकर अपना चुनाव प्रचार करते वीरप्पा कहते हैं, "जनता की मेरे प्रति सदभावना के कारण मैं इस चुनाव में भी जीत हासिल करुँगा."

वीरप्पा दलित हैं लेकिन उन्हें ब्राह्मण और लिंग्यत समुदायों का समर्थन मिलता रहा है.

चालीस डिग्री सेंटीग्रेड की गर्मी में वे हर रोज़ लगभग दस घंटे चुनाव प्रचार करते हैं.

सादा जीवन

उम्र ने उनका जोश कम नहीं किया है और उनका राजनीति से रिटायर होने का भी कोई इरादा नहीं है.

वे कहते हैं, "मैं स्वस्थ हूँ." लेकिन उन्हें ये जोश कहाँ से मिलता है?

उनका कहना है, "इसका जवाब तो भगवान ही दे सकते हैं." लेकिन वे ये भी कहते हैं कि वे सादा जीवन व्यतीत करते हैं.

जवानी में वीरप्पा पंडित नेहरू के साथ
वीरप्पा पहली बार 1952 में चुनाव लड़े थे

हुम्नाबाद नगर के कच्चे मकान में जन्मे वीरप्पा कहते हैं, "मैं न तो पान चबाता हूँ, न मांस-मदिरा के सेवन करता हूँ, न सिगरेट पीता हूँ और न रिश्वत के लेन-देन में यकीन रखता हूँ."

उनका आहार है घर की बनी मक्की की रोटी, सब्ज़ी और लाल मिर्च की चटनी.

बीदर के उपायुक्त अनिल कुमार कहते हैं कि नामांकन पत्र के मुताबिक वीरप्पा की उम्र 94 वर्ष है और वे सातवीं बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं.

अनिल कुमार कहते हैं कि हो सकता है कि वे इस आम चुनाव में सबसे ज़्यादा उम्र वाले उम्मीदवार हों.

बचपन से ही परिश्रमी

बचपन से ही खेत में कठोर परिश्रम करने वाले वीरप्पा कभी स्कूल नहीं जा पाए.

वीरप्पा नामांकन पत्र भरते हुए
वीरप्पा इस बार भी चुनाव लड़ रहे हैं

ब्रिटिश राज के दौरान उन्होंने काँग्रेस के नेतृत्व में आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया और उन्हें कालेपानी की सज़ा हुई.

भारत की आज़ादी के बाद उन्होंने अपने चुनावी जीवन का सफ़र शुरु किया 1952 में और तब से राजनीति में सक्रिय हैं.

जब उन्हें 1991 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे भाजपा की विचारधारा से प्रभावित होकर पार्टी में शामिल नहीं हुए थे.

उनका कहना है कि काँग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया इसलिए भाजपा में शामिल हो गए.

वे अपना अधिकतर समय अपने चुनाव क्षेत्र में ही बिताते हैं.

बीदर स्थित पत्रकार हृषिकेश बहादुर देसाई कहते हैं, "लोग उन्हें उनकी सादगी के कारण पंसंद करते हैं."

वहाँ के एक ग्वाले मलिकर्जुन कहते हैं कि वीरप्पा विवादों से दूर रहते हैं और इसलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि वे अलग तरह के राजनीतिक नेता हैं.