(बिंदास बाबू की डायरी)
प्रिय श्रोताओं, बीबीसी के लिए भी विक्रम संवत् 2061 में आर्यावर्त में लखनऊ नगर में एक फीलगुड नाम का आदमी रहता था.
उसकी एक फील गुड़िया थी.
फीलगुड रिक्शा चलाता था.
फीलगुड़िया घरों में बर्तन-झाड़ू करती थी.
चुनावी कलजुग चल रहा था.
हर जगह लालच-लोभ मचल रहा था.
एक दिन नगर सेठ ने ऐलान किया कि राजा जी के नाम पर सचमुच का सबको फीलगुड होना चाहिए.
नंगा,भूखा ‘फीलगुड’ वैरी बैड, वैरी बैड!
सो एक दिन नगर सेठ ने ऐलान किया कि भूखों को लड्डु मिलेगा.
राजा जी का जन्मदिन है.
आओ, खाओ, प्रसन्न हो जाओ, फीलगुड करो कराओ.
पूरे मुल्क का घी, दूध, शक्कर मिलाकर घरती के आकार का एक विराट महालड्डू बनाया गया और जनता जनार्दन के बीच वह फीलगुड महालड्डू ,छप्पन भोग बनकर वितरित किया गया.
सब लोग फीलगुड़ करने लगे.
बच्चों के नाम तक फीलगुड रखने लगे.
अचानक नगर सेठ को लगा.
फीलगुड तो हो गया.
फील गुड़िया तो हुई ही नहीं.
भारत की नारी के तन पर एक सारी तक नहीं दिखती.
वैरी बैड-वैरी बैड.
एक वक्त का जब भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की पुकार पर ये लंबी सारी सप्लाई की कि दुष्ट दुःशासन खींचते-खींचते थक गया लेकिन सारी खत्म नहीं हुई.
द्रोपदी को ये लंबी सारी दी थी कृष्ण भगवान ने तभी पांडव लोग फीलगुड कर सके थे.
लाज बच गई थी.
नगर सेठ को सूझा, क्यों न अपना बर्थ डे मना डाला जाए और फील-गुड़ियाओं को फीलगुड कराया जाए.
सेठ जी ने भगवान का ध्यान किया.
क्षण मात्र में स्वयं भगवान हो गए.
गाड़ी भर-भर कर फील-गुड़ियाएं लाई गईं.
सेठजी ने ट्रक भर कर साड़ी बाँटनी शुरू की.
दस पांच को बांट कर थक गए.
भोजन करने चले गए.
उसके बाद उनके कारिंदे आए.
वे चीर बढ़ाने की लीला के चक्कर में साड़ी फेंकने लगे.
सारी फील-गुड़ियाएं लाइन तोड़कर लपकने लगीं.
गिरने लगीं.
मुक्ति पाने लगीं.
इस तरह कई फील गुडों की फीलगुड़ियां सारी के लालच में भर गई.
सारे फीलगुड उदास हो गए.
राजा जी का चेहरा लटक गया.
नारी और सारी का ऐसी फीलगुड तक बनी कि यही नहीं मालूम पड़ता था कि नारी बीच सारी है या सारी बीच नारी है, नारी ही की सारी है कि सारी ही की नारी है.
हे श्रोताओं! कहानी का निष्कर्ष यह है कि सारी ने नारी नहीं मारी.
नारी ने ही सारी मारी है, क्योंकि इस फीलगुड आर्यावर्त में सौ नारी पर एक सारी भारी है.