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बोलांगीर में नदी और बाँध है मुद्दा

उड़ीसा के बोलांगीर ज़िले के जी डूंगरीपल्ली गाँव से कुछ समय पहले तक एक नदी बहती थी लेकिन आज वहाँ सिर्फ़ रेत ही रेत नज़र आती है.

इस नदी का सूखना और रेत ही अब यहाँ चुनावी मुद्दा बन गया है क्योंकि बोलांगीर में अक्सर सूखा पड़ता है और पानी की बड़ी किल्लत होती है.

महिलाओं को पानी भरने के लिए दूर-दूर से हैंडपंप तक आना पड़ता है और फिर भी पानी बहुत थोड़ा ही मिल पाता है.

हैंडपंप पर खड़ी एक महिला कहती हैं, ''खाना पकाने को तो पानी मिलता नहीं, नहाने का पानी तो दूर की बात है.''

महिला बताती है, ''सुखतेल नदी की रेत खोदते हैं और उससे जो छिछला पानी निकलता है उसी के छींटें मारकर नहा लेते है.''

बोलांगीर में पानी बरसता तो है लेकिन कभी कम तो कभी ज़्यादा.

सरकारी आँकड़ों के हिसाब से देखें तो बोलांगीर ज़िले की केवल छह प्रतिशत ज़मीन ही ऐसी है जिसकी सिंचाई की जा सकती है.

जबकि 1936 में जब ये इलाक़ा पटना स्टेट का हिस्सा हुआ करता था तब क़रीब 35 प्रतिशत हिस्सा सिंचित था.

अब तो लोग कहते हैं कि सिंचाई तो दूर की बात है, अब तो बोलांगीर शहर को ही पीने का पानी नसीब नहीं होता.

बाँध और विरोध

इस इलाक़े में पानी की समस्या 'लोवर सुखतेल बाँध परियोजना' से ही हल हो सकती है.

लेकिन बीजू जनता दल के विधायक और चुनाव की तैयारी में लगे एयू सिंहदेव का कहना है कि इस परियोजना से 18 प्रतिशत हिस्से में सिंचाई हो पाएगी और क्षेत्र की तरक़्क़ी होगी.

लेकिन इस बाँध के डूब क्षेत्र में जो गाँव आने वाले हैं उनके निवासी इस तर्क से सहमत नहीं है.

बाँध का विरोध कर रहे एक संगठन बूढ़ी आँचल संग्राम परिषद के अध्यक्ष गुन्नू साहू का कहना है, ''अगर बाँध बन गया तो सब कुछ डूब जाएगा. सरकार कह रही है कि सिर्फ़ 26 गाँव डूबेंगे लेकिन हमारा मानना है कि इसमें 56 गाँव डूबेंगे.''

बाँध का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि वे उसी को वोट देंगे जो बाँध का विरोध करेगा.

आँदोलन से जुड़ी एक महिला कहती हैं, ''अगर हमारा गाँव ही डूब गया तो हम क्या करेंगे?''

हालाँकि फ़िलहाल कोई भी नेता उनको समर्थन नहीं दे रहा है.

ऐसा लगता है कि लोगों के बाग़ी तेवर देखने के बाद भी अगर राजनीतिक दल और नेता कोई सबक नहीं सीखते हैं तो इनके वोटों को कोई बाँध नहीं पाएगा.