(बिंदास बाबू की डायरी)
एक बार फिर बिंदास बाबू का हैलो, हाय-हाय, हाय-हाय, राम-राम, सलाम, सत श्री अकाल.
वे कहते हैं कि वे विदेशी हैं.
और वे कहते हैं कि जो विदेशी कहने वाला है, स्वयं विदेशी है.
वे कहते हैं कि सोनिया विदेशी हैं, उनके बच्चे विदेशी हैं, विदेशी के हाथ में अपना झंडा कभी नहीं देंगे.
वे कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी विदेशी माल है, इस विदेशी को क्या हक़ है कि वह स्वदेशी की बात करे.
इस तरह हर दिन, हर जगह, हर पल देश में ‘तू विदेशी-तू विदेशी’ की कबड्डी होती रहती है.
कौन विदेशी-कौन स्वदेशी, पता ही नहीं चल पा रहा है.
एक गा रहा है, ‘परदेसियों से न अँखियाँ लड़ाना, परदेसियों को एक दिन है जाना’
दूजा गाता है, ‘परदेसी-परदेसी जाना नहीं, मुझे छोड़कर-मुझे छोड़कर.’
ज्ञानीजन सिर धुनते हैं और जनता जनार्दन ‘फॉरेन’ माल को क्वालिटी का समझ कर लपकती रहती है.
नेता लोग तो ‘फॉरेन’ ही चिल्लाते रहते हैं, ‘फॉरेन’ में ही रहा करते हैं.
एक ने कहा, ‘अग्रेज़ो’, भारत छोड़ो, वे 1947 में छोड़ गए.
बात 1942 की रही, अब किसी ने कहा 2004 में, बात जमी नहीं.
तुरंत दूसरे ने कहा, 1942 में संघ कहाँ था, 1920 में संघ कहाँ था, विदेशियों के ख़िलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की क्या भूमिका थी, उन्होंने कभी आंदोलनों में हिस्सेदारी नहीं की?
अब कहते हैं कि हम भी पीएम बनेंगे.
विदेशी मूल का आदमी पीएम कभी नहीं बन सकता या सकती यहाँ, हम उन्हें नहीं बनने देंगे.
दोनों एक-दूसरे को विदेशी कहते रहते हैं.
स्वदेशी-विदेशी में फ़र्क़ नज़र नहीं आता है.
जनता मस्त-कलंदर, पागल बनी हुई, सदा की भाँति, ‘आजा रे परदेसी’ करती रहती है.
पीएम ने कहा कि राजनीति में ‘पर्सनल अटैक’ की आवश्यकता नहीं.
चुनाव आयोग ने कहा कि ‘पर्सनल अटैक’ ज़रूरी नहीं.
मगर पर्सनल हुए बिना हिंदुस्तान में भला कुछ हो सकता है.
कुछ भी क्लिक नहीं करता है.
कोई नहीं सुनता, मज़ा नहीं आता, रस नहीं आता.
तू विदेशी – तू विदेशी की तू - तू मैं - मैं के बिना कुछ चुनाव का मज़ा कहाँ.
आख़िर पारिवारिक संस्कृति है भारत की. रिश्ते ही रिश्ते निकलते हैं.
इसलिए रिश्ते-नाते न निकाले जाएँ तो बात नहीं बनती है.
तो हे श्रोताओं, अखिल भारतीय तू तू- मैं मैं का मज़ा लो.
फिलहाल बाय-बाय...