1971 का साल बहुत ऐतिहासिक था.
इसी साल देश में परिस्थितियाँ बदल रहीं थीं और बंगलादेश की आज़ादी के लिए लड़ाई हुई.
इस लड़ाई में भारत की जीत हुई और इस जीत ने इंदिरा गांधी के पैर बहुत मज़बूत कर दिए.
दिसंबर में यह युद्ध हुआ और मार्च में राज्यों के चुनाव हो गए. इन चुनावों में कांग्रेस ने पूरे देश में जीत दर्ज की.
दिलचस्प बात थी कि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ख़त्म हो गई, पंजाब से अकालियों का सफ़ाया हो गया.
इस लिहाज़ से देखें तो वह इंदिरा गांधी के उत्कर्ष का समय था. उनकी महिमा बढ़ चुकी थी.
1972 के चुनाव में जीत एक बड़ा मुद्दा था. इंदिरा गांधी का अपना क़द बहुत बढ़ गया था और विरोधियों का क़द बिल्कुल घट गया था.
1972 से 74 तक का समय तो कोई बहुत कठिन समय नहीं था लेकिन उसके बाद कठिनाइयाँ शुरु हो गईं.
संजय गाँधी का दबदबा
देश में आर्थिक समस्याएँ थीं और भ्रष्टाचार के सवाल उठने लगे थे. यह वही समय था जब संजय गाँधी पर लोग सवाल उठाने लगे थे.
शुरुआती दिनों में तो इंदिरा गाँधी के सचिवालय, पीएन हक्सर आदि का बड़ा असर था.
जब जेपी का आंदोलन शुरु हो गया तब संजय गाँधी का दबदबा बढ़ा.
1973-74 में इंदिरा गाँधी के नज़दीकी माने जाने वाले लोगों का असर कम होना शुरु हुआ, उनमें पीएन हक्सर, उमाशंकर दीक्षित थे और कुछ हद तक मैं भी था.
उस वक्त एलएन मिश्र, वाईपी कपूर और आरके धवन का असर बढ़ना शुरु हुआ था. उसी समय धीरेंद्र ब्रहमचारी का असर बढ़ा.
लोग कुछ भी कहें लेकिन इंदिरा गाँधी की पकड़ उस वक़्त तक मज़बूत थी और उनके कानों में जिनकी रिसाई थी उनका प्रभाव बहुत बढ़ रहा था.
आपातकाल
दो तीन बातें ध्यान रखना चाहिए. एक तो जेपी का आंदोलन बढ़ रहा था. बिहार से शुरु हुआ यह आंदोलन बढ़ता ही जा रहा था.
दूसरी ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका पर इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ फ़ैसला दे दिया.
तो फिर एक नए क़िस्म का विवाद चला कि उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए या नहीं देना चाहिए.
यह एक हफ़्ता बहुत महत्वपूर्ण था और इसी में उनके ख़ास सलाहकारों की मंडली उनको आपातकाल की ओर ले गई.
आपातकाल तो भारतीय लोकतंत्र के ख़िलाफ़ था. सारे मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए और जो भी विरोध में थे वे जेलों में बंद कर दिए गए. इनमें जयप्रकाश भी शामिल थे.
वैसे जयप्रकाश नारायण बुनियादी तौर पर इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ नहीं थे, बस उनकी दो तीन शर्तें थीं कि वे यदि ऐसा कर दें तो बात ख़त्म हो सकती थी. लेकिन इंदिरा गाँधी से बात करके भी बात बनी नहीं.
इसी समय युवा तुर्क उभरे, जो थे तो कांग्रेसी लेकिन वे भ्रष्टाचार और दूसरे व्यक्तिवाद के ख़िलाफ़ थे.
आपातकाल के शुरुआती दिनों में तो लोगों को पता नहीं चला लेकिन ज्यों-ज्यों लोगों को समझ में आना शुरु हुआ उन्होंने कांग्रेस को घातक नुक़सान पहुँचाया और उन पार्टियों को उभरने का मौक़ा दिया जिनका आज बड़ा बोलबाला है.
उसी दौर में नए नेता भी उभरे और वे बेहद लोकप्रिय थे.
व्यक्तिपूजा
मूल दिक़्क़त उस दौर की थी - व्यक्ति पूजा.
एक हद तक तो यह पहले भी शुरु हो चुका था लेकिन वे बड़े लोग थे, महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू.
इंदिरा गाँधी के पहले दौर में तो यह संभव नहीं हो सका लेकिन दूसरे दौर में, लड़ाई के बाद वे भी इस दायरे में आ गईं.
बदक़िस्मती से भारतीय राजनीति में पार्टियों के भीतर कोई प्रजातंत्र नहीं है इसलिए पार्टियों के भीतर परिवारों का कब्ज़ा हो गया.
ये किसी एक पार्टी का मामला नहीं है बहुत सी पार्टियों में ये समस्या है और इसी से व्यक्ति पूजा शुरु होती है.