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शांति प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण चुनाव

श्रीलंका में शुक्रवार, दो अप्रैल को नई संसद के लिए मतदान हो रहा है.

पिछले चार सालों में होने वाला ये तीसरे संसदीय चुनाव हैं.

दिसम्बर 2001 में हुए चुनाव में गठजोड़ सरकार बनी थी.

उस समय पर्यवेक्षकों ने कहा था कि नतीजों से साफ पता चलता है कि लोग चाहते हैं कि दोनों मुख्य पार्टियाँ साथ मिलकर दो दशकों से चल रहा गृह युद्ध ख़त्म करें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

तमिल समस्या को लेकर राजनीतिक मतभेद के बाद राष्ट्रपति कुमारतुंगा ने फ़रवरी में संसद भंग कर चुनाव करवाने की घोषणा कर दी.

मतभेद

यूनाईटेड नेशनल पार्टी के नेता रनिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री बने और उन्हें काम करना था राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा के साथ जो विपक्षी गठबंधन युनाईटेड पीपुल्स फ़्रीडम एलायंस का नेतृत्व करती हैं.

चंद्रिका 1999 में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनी थीं.

प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने शांति प्रक्रिया के एक नये दौर की शुरूआत की लेकिन राष्ट्रपति कुमारतुंगा को इसमें शामिल करने में क़ामयाब नहीं हो सके.

राष्ट्रपति ने उनपर आरोप लगाया कि तमिल विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता के चक्कर में उन्होंने देश की सुरक्षा को ताक पर रख दिया.

फिर पिछले नवम्बर में राष्ट्रपति कुमारतुंगा ने रक्षा, गृह और सूचना मंत्रालय का अधिकार लेकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया.

हालाँकि ये क़दम संवैधानिक था लेकिन इससे प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे की सरकार को काफी चोट पहुँची.

उन्होंने साफ किया कि वो तमिल विद्रोहियों के साथ जनवरी में होने वाली वार्ता को तब तक आगे नहीं बढ़ा सकते जब तक सुरक्षाबल उनके नियंत्रण मं नहीं आते.

शांति वार्ता में मध्यस्थता करने वाले नोर्वे के प्रतिनिधियों ने भी ये स्वीकार किया कि जब तक ये साफ नहीं हो जाता कि श्रीलंका में सरकार पर किसका नियंत्रण है तब तक वो भी कुछ नहीं कर सकते हैं.

महीने भर तक यह जद्दोजहद जारी रही और फिर फ़रवरी में राष्ट्रपति ने संसद भंग कर दोबारा चुनाव कराने की घोषणा कर दी.

शांति में बाधा

राष्ट्रपति कुमारतुंगा को उम्मीद है कि उनकी यूनाईटेड पीपुल्स फ्रीडम एलायंस अगली सरकार बनायेगी, जिससे वैधानिक और कार्यकारी दोनों नियंत्रण उनके हाथ में आ जायें.

लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि अगर प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को फिर बड़ी जीत हासिल होती है तो दोनों के बीच ये विवाद इसी तरह चलता रहेगा.

राष्ट्रपति कुमारतुंगा का कहना है कि संविधान के अनुसार रक्षा विभाग राष्ट्रपति के अधिकार में आता है.

अभी तक ये साफ़ नहीं है कि वो इसे प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि को वापस देंगी या नहीं.

उधर प्रधानमंत्री अपनी जीत को शांति वार्ता बहाल करने के लिए लोगों का संकेत मानेंगे और राष्ट्रपति को रक्षा विभाग के मसले पर झुकाने की पूरी कोशिश करेंगे.

हालाँकि दोनों के बीच इस शक्ति संघर्ष से शाँति प्रक्रिया पर ज़रूर असर पड़ सकता है.

शांति

गृह युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक श्रीलंका में सबसे ज़्यादा समय तक शांति इसी बार क़ायम रह सकी है.

2002 में युद्विराम लागू होने के बाद यात्रा से प्रतिबंध हटे, सैकड़ों विस्थापित घर लौटे और उत्तर-पूर्व में दोबारा निर्माण शुरू हुआ.

जहां 2000 में हर रोज़ लगभग 11 लोग इस संघर्ष में मारे जाते थे, वहीं पिछले दो सालों से बंदूकें एकदम शांत हैं.

लेकिन इस बीच तमिल टाईगरों ने कई बार युद्धविराम का उल्लंघन भी किया.

बच्चों को सेना में भर्ती करना जारी रखा, हत्याऐं और पैसा वसूली भी चलती रही.

लोकतंत्र का सवाल तो वहीं का वहीं है. लेकिन फिर भी ये कहा जा सकता है कि तमिल विद्रोहियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवादी क़रार देकर प्रतिबंधित हुए गुट को एक राजनीतिक आंदोलन का रूप देने का काम शुरू किया.

प्रमुख पार्टियों का कहना है कि हालाँकि दोनों ही शांति प्रक्रिया जारी रखेंगे, लेकिन राष्ट्रपति कुमारातुंगा का गठजोड़ जेवीपी से है, जिसके नेता इस संघर्ष के संघीय समाधान का विरोध करते हैं.

तमिलों में टूट

इस शांति प्रक्रिया का एक बड़ा नतीजा ये रहा कि विद्रोही संघीय रूप से सत्ता में भागेदारी के लिए तैयार हो गए.

इसके बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसके लिए साढ़े चार अरब की राशि देने की घोषणा कर दी.

लेकिन हालात तब गंभीर हो गए जब मार्च में तमिल विद्रोहियों की सेना का एक वरिष्ठ कमांडर, कर्नल करूणा, आंदोलन से अलग हो गए.

कर्नल करूणा ने आरोप लगाया कि मूल रूप से उत्तर से होने की वजह से एलटीटीई नेता पूर्व से आये तमिलों से भेदभाव करते हैं.

अभी तक न तो राष्ट्रपति और ना ही नॉर्वे के मध्यस्थों ने एलटीटीई से अलग हुए गुट को मान्यता दी है.

उन्हें पता है कि अगर वो ऐसा करते हैं तो मुख्य विद्रोही गुट से तालमेल करना मुश्किल हो जायेगा.

फिर भी डर है कि अगर ये दोनों गुट आपस में लड़ने लग गए तो देश की सेना को भी इसमें दख़ल देना पड़ेगा.