श्रीलंका में संसद के लिए हो रहे चुनाव में मतदान समाप्त हो गया है. मतदान में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया.
इस संसदीय चुनाव को तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई के साथ शांति वार्ता के लिए जनमत संग्रह की तरह देखा जा रहा है.
राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के बीच मतभेद के कारण देश में संकट पैदा हो गया था.
जानकारों का कहना है कि मुख्य पार्टियों में से किसी को बहुमत मिलने के कम ही आसार हैं.
देश के ज़्यादातर हिस्सों से बड़े पैमाने पर मतदान होने की ख़बरें मिली हैं.
अनुमान
चुनाव सर्वेक्षकों के अनुसार शुरू से ही मतदान अच्छा रहा. अनुमान है कि एक करोड़ 20 लाख पंजीकृत मतदाताओं में से क़रीब 75 प्रतिशत लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया.
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जयंत विक्रमर्ते ने बताया कि सूचीबद्ध मतदाताओं में से क़रीब आधे से अधिक लोग दोपहर तक मतदान कर चुके थे.
इस बार के चुनाव में अपेक्षाकृत शांति रही और कहीं से भी हिंसा की कोई बड़ी ख़बर नहीं मिली है जबकि पिछले चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंसा और धांधली की घटनाएँ हुईं थीं.
श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों से भी भारी मतदान के समाचार मिले हैं जहाँ तमिल बड़ी संख्या में रहते हैं.
शांति प्रक्रिया पर राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के बीच मतभेद के बाद इस वर्ष फ़रवरी में राष्ट्रपति ने संसद भंग कर दी जिसकी वजह से नए सिरे से चुनाव हुए.
मतदान के लिए श्रीलंका में इस बार अभूतपूर्व सुरक्षा इंतज़ाम किए गए थे.
पहली बार हर मतदान केंद्र पर चुनाव पर्यवेक्षक तैनात किए गए थे.
इसी सप्ताह वहाँ चुनाव पूर्व हिंसा में एक तमिल उम्मीदवार की हत्या कर दी गई थी.
शंका
जानकारों का कहना है कि बार-बार होने वाले चुनावों से मतदाता परेशान हैं और उन्हें यह शंका है कि नई सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगी या नहीं.
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वैसे इस बार चुनावी दौड़ में दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियों में से किसी एक को स्पष्ट बहुमत मिल पाएगा, इसके आसार कम ही नज़र आ रहे हैं.
त्रिशंकु सदन की हालत में तमिल टाइगर विद्रोहियों के समर्थन वाला गठबंधन तमिल नेशनल अलायंस भावी सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
मगर एक बात तय है कि तमिल शांति प्रक्रिया के भविष्य के लिए ये चुनाव बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं.