पूर्वोत्तर के पर्वतीय राज्यों में आगामी लोकसभा चुनाव एकदम अलग स्थितियों में हो रहे हैं.
पर यह मौलिक बदलाव न तो किसी एक राजनीतिक घटना से हुआ है और न ही हर राज्य में एक तरह से आया है.
पर यह बात उल्लेखनीय है कि सभी छोटे राज्यों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में काफ़ी बदलाव आए हैं और इसने पहले से स्थापित राजनीति को काफी बदल दिया है.
इन राज्यों के बड़े बदलावों को बाहर के लोगों ने क्यों नहीं देखा-समझा, इसके अनेक कारण हैं.
इसकी पहली वजह तो इनका आकार है.
इन सात राज्यों (पूर्वोत्तर की सात बहनें माने जाने वाले राज्यों में से असम को छोड़ने और सिक्किम को जोड़ने से बना सात) में लोकसभा की सिर्फ़ 11 सीटें हैं.
दिल्ली की राजनीति के लिए इतनी सीटों का बहुत वज़न नहीं है.
फिर दिल्ली की गद्दी के लिए लड़ रही दोनों प्रमुख पार्टियों की यहां ख़ास उपस्थिति भी नहीं है.
साथ ही अगर नीति निर्माताओं में पूर्वोत्तर के प्रति अज्ञान और उपेक्षा के भाव को जोड़ लें तो यह बात साफ हो जाएगी कि यहाँ के बदलावों पर कोई चर्चा क्यों नहीं हुई.
नीति-निर्माताओं की ही क्यों कहें भारत के अच्छे खासे ‘ पढ़े-लिखे‘ व्यक्ति को भी नक्शे में मणिपुर या मिजोरम और मेघालय को ठीक-ठीक पहचान जाने को कहा जाए तो उसे दिक्कत होगी ही.
बहुत कम ही लोगों को मालूम होगा कि मणिपुर में जब मतदान पहली बार कराया गया था तब भारत में संविधान लागू भी नहीं हुआ था.
ऐसे ही यह तथ्य भी कम लोगों को मालूम होगा कि मिज़ोरम में साक्षरता की दर मुल्क में सर्वाधिक है या यह तथ्य भी ख़ास प्रचारित नहीं है कि मेघालय में मतदान का प्रतिशत सर्वाधिक रहा करता है.
पहले से ज़्यादा असर
अगर इन बदलावों पर इस बार राष्ट्रीय मीडिया थोड़ा ध्यान दे रहा है तो उसका कारण सिर्फ इतना ही है कि इस बार पूर्वोत्तर में परिणामों का कांग्रेस और भाजपा की लड़ाई पर पहले से ज़्यादा असर पड़ेगा.
![]() पूर्वोत्तर राज्यों में सुविधाओं का अभाव बड़ा मुद्दा है |
कभी पूर्वोत्तर के हर राज्य में उसकी मज़बूत उपस्थिति राष्ट्रीय राजनीति में उसकी मज़बूती को दर्शाती थी.
1989 के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन मुल्क भर में ख़राब रहा पर पूर्वोत्तर की 11 में से 10 सीटें उसकी झोली में गईं.
इसके बाद से कांग्रेस की संख्या गिरती ही गई है.
1998 में उसे सिर्फ़ तीन और 1999 में चार सीटें ही मिलीं.
इस बार उसकी सीटें और घटने का अंदेशा है और संभव है कि उसका पूर्वोत्तर से पूरी तरह सफ़ाया ही हो जाए.
सीटों की संख्या का भले ही ज़्यादा मतलब न हो पर पूर्वोत्तर में राजनीतिक वजूद का महत्व तो है ही.
पर कांग्रेस को नुक़सान से सीधे भाजपा को लाभ मिलने वाला हो ऐसा भी नहीं है.
खुल सकता है खाता
पूर्वोत्तर के राज्यों में भाजपा ने अभी तक कोई सीट नहीं जीती है.
![]() कई राज्यों में सुरक्षा की समस्या काफ़ी गंभीर है |
संभव है कि अरुणाचल प्रदेश में इस बार उसका खाता खुल जाए.
मगर ख़ुद सीटें जीतने की जगह शासक दल के लिए यह स्थिति भी लाभकर होगी कि पूर्वोत्तर से उसके मित्र दल और साथी जीत जाएँ.
यह चीज़ अपने आप में महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पूर्वोत्तर को भाजपा की राजनीति के लिए सबसे मुश्किल इलाका माना जाता था.
अब भाजपा एक बार और केन्द्र में सरकार बना पाती है या नहीं ये तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता मगर उसे इस बार एक और बड़ी सफलता तो मिलनी ही है दरअसल वह इस बार असली अर्थों में राष्ट्रीय पार्टी बनने वाली है, जिस तरह आज़ाद भारत में कांग्रेस रही है.
पर पूर्वोत्तर के चुनाव नतीजों को राष्ट्रीय राजनीति के हिसाब से इतने सांकेतिक रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए.
शेष मुल्क के लिए यहां की राजनीति का बहुत मतलब नहीं है वे इसे ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्रीय राजनीति ही मानते रहे हैं.
मगर पूर्वोत्तर के राज्य भी शेष मुल्क वाले रास्ते ही चले हैं- कम से कम पिछले एक दशक की अवधि में .
वही राजनीतिक बिखराव, वही क्षेत्रीय दल, वही जातीय पहचान की राजनीति यहाँ भी प्रबल हुई है.
इसीलिए यहां की चुनावी राजनीति और स्थानीय राजनीति के संभावित नतीजों को ठीक से समझना ज़्यादा ज़रुरी है.
(अगले अंक में हम राज्यवार ढंग से पूर्वोत्तर की राजनीति को समझने की कोशिश करेंगे.)