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लड़कियों के लिए क़ानून पर विवाद

जम्मू कश्मीर की विधानसभा में राज्य की लड़कियों के विवाह को लेकर बनाए गए नए क़ानून को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है.

राज्य की महिलाओं ने इसकी कड़ी निंदा की है तो देश के कई राजनीतिक दलों ने इस पर आपत्ति जताई है.

शुक्रवार को मुफ़्ती मोहम्मद सईद सरकार ने जम्मू कश्मीर विधानसभा में सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित किया है.

इसके तहत राज्य की उन लड़कियों के बहुत से क़ानूनी अधिकार ख़त्म हो सकते हैं जो किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करती है जो वहाँ का मूल निवासी न हो.

यदि कोई लड़की ऐसे किसी व्यक्ति से शादी करती है जो राज्य का मूल निवासी न हो तो उसका मूल निवासी का दर्जा शादी के ही दिन से ख़त्म हो जाएगा.

इसका मतलब यह होगा कि इसके बाद न तो वह लड़की जम्मू कश्मीर में कोई संपत्ति रखने की पात्र होगी न ही सरकारी नौकरी पाने की. हालांकि पैतृक संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी बची रहेगी.

वोट देने का उनका अधिकार भी उनसे छिन जाएगा.

उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर में धारा 370 लागू है जिसके तहत वहाँ के लिए विधानसभा अपने अलग क़ानून बना सकती है. इसी विशेष दर्जे के तहत राज्य में कोई ऐसा व्यक्ति संपत्ति नहीं ख़रीद सकता या सरकारी नौकरी नहीं पा सकता जो राज्य का मूल निवासी न हो.

इस विधेयक को राज्य के सभी राजनीतिक दलों ने अपना समर्थन दिया था और यह सर्वसम्मति से पारित हुआ था.

इतिहास और क़ानून

ऐसा एक क़ानून पहली बार 1927 में बनाया गया था जब राज्य पर डोगरा शासकों का राज था.

डोगरा राजा को लगता था कि ब्रितानी शासक बाहरी लोगों को कश्मीर में संपत्ति ख़रीदने को बढ़ावा दे सकते हैं जिससे उनकी सत्ता कमज़ोर पड़ सकती है.

इसके बाद उन्होंने जो क़ानून बनाया उसके तहत लड़कियों को राज्य में तभी तक मूलनागरिक होने का अधिकार दिया गया था जब तक उनका विवाह न हो जाए.

उस समय भी जम्मू के इलाक़े में रहने वाले हिंदुओं ने इस क़ानून का विरोध किया था जो अपनी बेटियों की शादी देश भर में किया करते थे.

इस समय इस नए क़ानून की ज़रुरत 2002 में हाईकोर्ट के एक निर्णय के बाद पड़ी है.

इस निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा था कि विवाह के बाद भी राज्य की लड़कियों को नागरिकों के अधिकार हासिल रहेंगे.

इस निर्णय का राजनीतिक दलों ने विरोध किया था क्योंकि वे मानते हैं कि इससे जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य वाला दर्जा ख़त्म होने की स्थिति बन जाएगी.

बाद में राज्य सरकार ने इस निर्णय को सर्वोच्त न्यायालय में चुनौती दी थी लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया गया क्योंकि क़ानूनविदों का मानना था कि यदि फ़ैसला ख़िलाफ़ आया तो विधानसभा में विधेयक पारित करवाने के रास्ते बंद हो जाएँगे.

इसके बाद शुक्रवार को यह विधेयक पारित कर दिया गया.

विरोध

इस विधेयक का जम्मू कश्मीर की महिलाओं ने विरोध किया है.

सिमरन शर्मा कहती हैं कि यह क़ानून राज्य की लड़कियों के मानवाधिकारों का हनन करता है.

जबकि व्याख्याता और सामाजिक कार्यकर्ता निर्मल कमल कहती हैं, '' यह क़ानून महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करता है.''

भारतीय जनता पार्टी ने भी इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा है कि वह इसे चुनावी मुद्दा बनाएगी.

जम्मू कश्मीर विधानसभा में विपक्षी दल नेशनल कांफ़्रेंस के विधायकों ने तो इसका समर्थन किया लेकिन बाहर पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुल्ला ने इस पर आपत्ति जताई है.