शनिवार, 06 मार्च, 2004 को 05:10 GMT तक के समाचार
राजेंद्र धोड़पकर
कार्टूनिस्ट और लेखक
होली यूं तो एक दिन का त्यौहार है लेकिन इस बार होली का त्यौहार लंबा खिंच गया है.
ये लगभग दीवाली से शुरु हुआ है और सावन तक चलेगा क्योंकि चुनाव है.
चुनाव के महीनों पहले ही कुएँ में भांग पड़ चुकी है और सब लोग बौरा गए हैं.
कुएँ में भांग डालने की जल्दी इसलिए थी कि पिछले साल मानसून अच्छा आया था और कुएँ में पानी है.
इस साल ख़तरा यह था कि मानसून अच्छा न रहे तो कुएँ में पानी न रहे तो भांग किसमें डालेंगे और लोग 'फ़ील गुड' कैसे महसूस करेंगे.
बौराए लोग
इस भांग के 'फ़ील गुड' की विशेषता यह है कि सब बौराए हैं.
ये हाल है कि लोग नेताओं से नहीं पूछते कि आप किस पार्टी में हैं क्योंकि कई सारे नेता ख़ुद नहीं जानते कि वे किस पार्टी में हैं.
लेकिन लोग अभिनेताओं से पूछ रहे हैं कि आप किस पार्टी में हैं क्योंकि हर रिटायर्ड, फ़्लॉप या बेरोज़गार अभिनेता किसी न किसी पार्टी में है.
और पार्टी वाले कम से कम इतनी मेहनत कर ही रहे हैं कि उन्हें अपनी पार्टी का नाम और सबसे बड़े नेता का नाम याद करवा दे रहे हैं.
जो अभिनेता भाजपा में हैं वे भारतीय जनता पार्टी और अटल बिहारी वाजपेयी का नाम जानते हैं. और यह घोर संदेह का विषय है कि उनसे पूछा जाए कि लालकृष्ण आडवाणी कौन हैं तो वे चुप लगा जाएँ क्योंकि इतनी जानकारी भी बेचारों के नाज़ुक दिमागों पर बोझ है.
कांग्रेस में तो पुराने कांग्रेसी भी सिर्फ़ सोनिया गाँधी का नाम जानते हैं या कम से कम ऐसा दिखावा तो करते ही हैं.
सुना गया है कि कुछ नेता मुंबई पहुँचे हुए हैं और फ़िल्म निर्माताओं से कह रहे हैं कि अगर रिटायर्ड और फ़्लॉप अभिनेताओं का राजनीति में इतना स्वागत हो रहा है तो बदले में निर्माताओं को रिटायर्ड और फ़्लॉप नेताओं को काम देना चाहिए.
पहचान का संकट
इस होली में लोग इस कदर रंगे हुए हैं कि चेहरे पहचानना मुश्किल है.
लोग सोनिया गाँधी के यहाँ चाय पी आते हैं, किसी और पार्टी में नाश्ता कर आते हैं और भाजपा दफ़्तर में मिठाई खा लेते हैं.
और अंत तक पता नहीं चलता कि वे कौन हैं और कहाँ हैं.
ये भांग का मौसम है और सारी विचारधाराएँ और विचार स्थगित हैं.
भाजपाई भारत उदय-भारत उदय की रट लगाए बैठे हैं और उन्हें तरंग में यह भी याद नहीं है कि सूरज पूर्व से उगता है या पश्चिम से.
कांग्रेसी चुपचाप इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि भाजपा वाले सेल्फ़ गोल कर दें तो वे जीत जाएँ. ख़ुद उठकर गोल करना कांग्रेस की फ़ितरत में नहीं है.
बाक़ी सब गेंद के इर्द गिर्द गोल गोल घूम रहे हैं कि पता नहीं किधर गोल मारने में फ़ायदा हो.
होली के रंग और तरंग में ये हाल है कि कोई किसी को पहचान नहीं रहा है. यहाँ तक कि लोग अपने आपको नहीं पहचान पा रहे हैं.
किसी को पचास पचपन की उम्र में अचानक इलहाम होता है कि भाजपा धर्म निरपेक्ष पार्टी है तो किसी को अचानक कांग्रेस की महत्ता पता चलती है.
बल्कि यह भी हो रहा है कि किसी को नौ बजकर 32 मिनट पर कांग्रेस उजली नज़र आती है और दस बजकर 15 मिनट पर भाजपा की महानता समझ में आती है.
बाकि बची आम जनता तो उसे इन नेताओं ने चुन लिया है यह उसका दुर्भाग्य है. और अब वे उसके पीछे लगे हुए हैं कि वो भी उन्हें चुनें.